सीकर से आकर बाड़ी माता व गौसेवा में जुट गए महंत चुन्नीलाल टांक

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हंसा हम रोए। ऐसी करनी कर चलो, हम हंसे जग रोए।।
बिजयनगर। कबीरा की इन पंक्तियों को आत्मसात् करते हुए अपना सम्पूर्ण जीवन बाड़ी माता के श्रीचरणों में अर्पित कर दिया था मंदिर महंत स्व. चुन्नीलाल टांक ने। माता का प्रसिद्ध भजन ‘चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है’ की तर्ज पर स्व. टांक भी सीकर में नेछवा गांव से निकटवर्ती बाड़ी गांव में आकर बस गए और माताजी की महिमा व गौसेवा के प्रचार प्रसार में जीवन को समर्पित कर दिया।
इसलिए आज भी स्व. टांक माता के भक्तों के दिलों पर राज करते हैं।

राजस्थान के सीकर जिले के नेछवा गांव में माता श्रीमती राधा देवी एवं पिता रूपचन्द टांक के घर सन् 1935 में चुन्नीलाल टांक का जन्म हुआ था। वे अपने स्कूली जीवन में कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। इसलिए उनके गुरु सीताराम जोशी ने उनकी कुशाग्रता और लेखनी से प्रभावित होकर उन्हें कक्षा 5 में पदोन्नत कर दिया। पूरे गांव में उनके सुन्दर लेखन की चर्चा होने पर पूर्व राष्ट्रपति स्व. भेरोसिंह शेखावत जो कि राजनीति में पदार्पण से पूर्व पूर्व पुलिस विभाग में इन्हीं के गांव में तैनात थे, वे भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे।

स्व. शेखावत भी उन्हें थाने पर बुलाकर लेखन सबंधी कार्य करवाते थे। एसके कॉलेज सीकर से डिग्री लेने के बाद वे शिक्षा विभाग में नियुक्त हो गए। सन् 1969 में वाणिज्य व्याख्याता के तौर पर बिजयनगर के नारायण सीनियर स्कूल में नियुक्त हो गए।

यूं बने माता के भक्त
बिजयनगर आगमन पर चुन्नीलाल टांक ने भागचन्द सोनी के मकान में किराए पर रहने लगे। इस दौरान सोनी ने स्व. टांक को बताया कि पास के गांव बाड़ी में माता का मंदिर है जहां पर माता के दर्शन करने वाले भक्तों को फूल-पत्ती का पर्चा देती हैं। एक दिन चुन्नीलाल टांक भागचन्द सोनी के साथ साइकिल से बाड़ी माता के दर्शन करने मंदिर पहुंचे और दर्शन करने के बाद घर आ गए। इस घटना के कुछ दिन बाद ही मंदिर के तत्कालीन महंत चुन्नीलाल टांक को ढूढ़ते हुए नारायण स्कूल में उनसे सम्पर्क किया। महंत ने टांक से कहा कि बाड़ी माता उनके स्वप्न में आई थी और उनको कहा कि यदि बिजयनगर स्कूल के अध्यापक चुन्नीलाल को कोई तकलीफ है तो वो मेरे यहां आकर फूल-पत्ती क्यों नहीं चढ़ा देता।

इस पर टांक बाड़ी माता मंदिर पहुंचे और अंग्रेजी भाषा में पर्चा मां के चरणों में अर्पित कर दिया। नकारात्मक जवाब आने पर उन्हें बुरा सा लगा। उसी दिन रात्रि में बाड़ी माता उनके सपनों में आई और आकर कहा कि बेटा तूने मुझे अंग्रेजी पढ़ाई या मैंने तुझे? इसके बाद टांक की श्रद्धा माता के चरणों में उमड़ पड़ी।

20 दिसम्बर 1970 को नवरात्रि के दौरान टांक ने अपने घर में माता का दरबार सजा रखा था और उसी के सामने सो रहे थे, तभी सुबह 4 बजे उन्हें अहसास हुआ कि वे आत्मिक रूप से बाड़ी माता मंदिर में मौजूद हैं। इस अहसास के बाद टांक ने अपनी वेशभूषा, आचार-विचार सबकुछ छोड़कर गृहस्थ जीवन होने के बावजूद माता की सेवा में अपने आप को लगा दिया। पैंट शर्ट की जगह धोती-कुर्ता पहनने लगे तथा जूतों का त्याग कर नंगे पैर रहने लगे। बाद में उन्होंने बाड़ी माता मंदिर परिसर को ही अपना आवास बना लिया। समय के साथ-साथ टांक की मेहनत और भक्ति को देखकर श्रद्धालु इस मंदिर से जुड़ते गये और सभी के सहयोग से टांक नेइस मंदिर को भव्य मंदिर में तब्दील कर दिया। तभी से यह मंदिर बाड़ी धाम कहलाता है।

क्षेत्र की सबसे बड़ी गौशाला है यहां
टांक के अथक प्रयास और उनकी सेवा भावना का ही परिणाम है कि वर्तमान में बाड़ी गांव में मंदिर की जमीन पर क्षेत्र की सैकड़ों गायों का पालन-पोषण यहां की गौशाला में हो रहा है। सबसे पहले गौशाला खोलने का बीड़ा उन्होंनें ही उठाया और भक्तों को इसके लिए प्रेरित करते रहे। क्षेत्र में कहीं भी गौवंश की दुर्घटना या बिमारी की सूचना मिलने पर गौशाला का रोगी वाहन सम्बंधित क्षेत्र में पहुंचकर गौवंश को गौशाला में पहुंंचाता है। वहां पर उपचार की सम्पूर्ण व्यवस्था गौशाला समिति की ओर से नि:शुल्क की गई है।

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