उनकी आंखें, दृष्टि तुम्हारी

आंखें किसी भी व्यक्तित्व का पूरा आइना होती हैं। ऐसे में किसी भी व्यक्ति को मरणोपरांत आंखें दान करवाने के लिए स्वयं उसे अथवा उसके परिजनों की सहमति लेना राई के पहाड़ से सूई ढूंढने जैसा है। इसके बावजूद शहर के स्वयंसेवी संस्थाएं जी-जान से जुटी रहती हैं। स्थिति वाकई कठिन होते होंगे लेकिन इरादे नेक हों तो कुछ भी असंभव नहीं…..।
बिजयनगर। बिजयनगर में सामाजिक संस्थाएं काफी सक्रिय हैं। मरणोपरांत ही सही, किसी की आंखें दान करवाने के लिए परिजनों को प्रेरित करना वाकई दुरुह और प्रेरणादायी कार्य है। बिजयनगर के सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ता इसके लिए काफी मशक्कत करते हैं। उन्हीं की मेहनत का नतीजा है कि बिजयनगर जैसे छोटे शहरों में दर्जनों लोगों के परिजनों ने आंखें दान करने के लिए हामी भरी। प्रस्तुत है खारीतट संदेश की यह विशेष रिपोर्ट….

450 लोगों से संकल्प पत्र भरवाए गए हैं
जैन सोश्यल ग्रुप द्वारा प्रत्येक महावीर जयंती पर नेत्रदान जैसे पुनीत कार्य के लिए लोगों से संकल्प पत्र भरवाया जाता है। अब तक नेत्रदान के लिए लगभग 450 संकल्प पत्र भराए गए हैं। इसलिए किसी की मृत्यु हो जाने पर परिजनों को प्रेरित करने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। हमको सिर्फ संकल्प पत्र के आधार पर सम्पर्क करना होता है। जिन लोगों को संकल्प पत्र भरा हुआ नहीं होता है, ऐसे किसी व्यक्ति की अचानक मृत्यु होने पर जानकारी में आते ही परिवार में जाकर संत्वना प्रकट करते हैं और परिजनों से नेत्रदान करवाने की बात करते हैं। इस पुनीत कार्य के लिए परिजन अपनी सहमति प्रदान कर देते हैं। उसके बाद ही नेत्रदान करवाया जाता है।


-सुभाष लोढ़़ा, जोन कोर्डिनेटर, जैन सोश्यल ग्रुप, नोर्थन रीजन

पहले सांत्वना, फिर निवेदन
जैसे ही पता चलता है कि किसी के यहां अनहोनी हो गई है तो परिषद के तीन-चार सदस्य उनके घर जाकर सांत्वना देते हैं। उसके बाद परिजनों को बताते हैं कि नेत्रदान करके किसी बिना आंखों वाले इंसान के लिए उसकी जिंदगी में खुशियां लौटा सकते हैं, उसके जहां में रोशनी भर सकते हैं। वैसे सभी परिजन नेत्रदान के लिए सहमति दे देते हैं।


जितेन्द्र पीपाड़ा, सचिव भारत विकास परिषद, शाखा-बिजयनगर

लोग जागरूक हो रहे हैं…
नेत्रदान के लिए परिजनों से सम्पर्क कर बताया जाता है कि आप द्वारा कराए गए नेत्रदान से किसी के जीवन का अंधकार हमेशा के लिए दूर हो सकता है, वह फिर से दुनिया को देख सकता है, यह पुनीत का कार्य हैं और इसमें हमें अपनी भागीदारी निभानी चाहिए। वैसे भी अब सभी लोग नेत्रदान को लेकर धीरे-धीरे जागरूक हो रहे हैं।


अतुल जैन, सचिव, लायंस क्लब ‘रायल’, बिजयनगर

इस पुनीत कार्य के लिए करते हैं सम्पर्क
नेत्रदान कराने के लिए परिजनों से सम्पर्क कर नेत्रदान जैसे पुनीत कार्य की जानकारी देते हुए उनको बताया जाता है कि मृत शरीर में आंखों का कोई इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन यदि इन्हीं नेत्रों को दान कर दिया जाता है तो ये नेत्र किन्हीं दो व्यक्तियों की जिंदगी रोशन कर सकते हैं। परिजन नेत्रदान के लिए अपनी सहमति जता देते हैं। इसके बाद नेत्र उत्सर्जित करने की प्रक्रिया चिकित्सों द्वारा की जाती हैं।


शांतिकुमार चपलोत, पूर्व अध्यक्ष श्री प्राज्ञ जैन युवा मंडल

मैंने भी देहदान का संकल्प पत्र भरा है
किसी की मृत्यु की जानकारी मिलते ही उनके परिजनों से मिल सांत्वना जता नेत्रदान के लिए बात करते हैं। परिजनों को बताया जाता है कि इनके नेत्रों से किसी दो इंसानों की दुनिया को रोशन किया जा सकता है। यह ण्क पुण्य का कार्य है। इस पर परिजन आसानी से नेत्रदान के लिए अपनी सहमति प्रदान कर देते हैं। वैसे इन दिनों में देखा जा रहा है कि नेत्रदान को लेकर व्यापक जागरूकता फैली है। वैसे शहर में बहुत से व्यक्तियों ने जीवित नेत्रदान का संकल्प पत्र भरा था। मैंने भी अपने मरणोपरांत देहदान का संकल्प लिया हुआ है।


-मुकेश तायल, अध्यक्ष लायंस क्लब क्लासिक, बिजयनगर

स्वयंसेवी संस्थाओं से मिली प्रेरणा
मुझे अपने पिताजी के नेत्रदान करवाने की प्रेरणा स्थानीय भारत विकास परिषद, जैन सोश्यल ग्रुप से मिली। इन संगठनों के पदाधिकारियों ने बताया कि मेरे पिताजी के दोनों नेत्रों से किन्हीं दो व्यक्तियों की जिंदगी में रोशनी लौट आएगी और मेरे पिताजी के दोनों नेत्र अमर रहेंगे। वैसे नेत्रदान को लेकर मैं पहले से ही जागरूक था। मैंने परिवार में बड़ों से बात की तो परिवार वाले भी नेत्रदान को लेकर सहमत थे।


-नवीन चौपड़ा, बिजयनगर

पराई आंखों से देखते हैं दुनिया
नेत्रदान के लिए परिजनों से सम्पर्क कर नेत्रदान के बारे में समझाया जाता है कि यह पुण्य का काम है इसलिए हमें यह पुण्य कमाना चाहिए, वैसे अब तक आसानी से परिजन नेत्रदान के लिए अपनी सहमति जताते हैं। परिजनों को बताया जाता है कि अपने परिजन के इन दो नेत्रों से किन्ही दो व्यक्तियों का जहां रोशन किया जा सकता हैं।


सुधीर गोयल, डायरेक्टर, लायंस क्लब बिजयनगर

मुझे नेत्रदान की प्रेरणा जैन सोश्यल ग्रुप से मिली। इसके बाद मैंने घर-परिवार में नेत्रदान करने को लेकर बात की और बताया कि अपने भाईसाहब के नेत्रदान करने से किन्ही दो व्यक्यिों की जिंदगी रोशन हो सकेगी और भाईसाहब के नेत्र भी अमर रहेंगे। इस पर सभी परिजनों ने सहमती दे दी।


पवन मंडिया, बिजयनगर

मैं लायंस क्लब क्लासिक का पदाधिकारी हूं। हमारा क्लब रक्तदान और नेत्रदान को लेकर जागरूकता को लेकर नित नए प्रचार-प्रसार में जुटा रहता है। वैसे पिताजी ने जीवित रहते ही नेत्रदान करने का संकल्प पत्र भरा हुआ था। इसलिए नेत्रदान के लिए सहमति लेने वाली कोई बात तो थी नहीं। मेरे पिताजी के दोनों नेत्रों से किन्हीं दो लोगों का जहां रोशन हुआ इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। मैं अधिकतर रामस्नेही अस्पताल आता-जाता रहता हूं। मुझे अच्छे से याद है कि भीलवाड़ा में एक लड़की है जिसको पहले दिखाई नहीं देता था, लेकिन अब जब उसको दान किए हुए नेत्र लगा दिए गए उसके बाद जहां तक मुझे पता है वो स्कूल टॉप करती है। तब से नेत्रदान के प्रति और अधिक जागरूकता को लेकर मेरा और अधिक ध्यान रहा है। मैं यही कहना चाहूंगा कि मृत शरीर में आंखों का कोई इस्तेमाल नहीं होता है, लेकिन इन्ही दो नेत्रों से किसी के अधंकारमय जीवन में रोशनी लाई जा सकती है। इसलिए सभी को नेत्रदान को लेकर जागरूकता फैलानी चाहिए।


निहालचन्द मुणोत, बिजयनगर

ताजा गाइड लाईन के अनुसार नेत्र उत्सर्जित करने के लिए गर्मी में मृत्यु से 6 घंटे के भीतर और सर्दी और बारिश के सीजन में मृत्यु से 8 घण्टे के भीतर नेत्र उत्सर्जित किए जा सकते हैं।
नेत्र उत्सर्जित करने के लिए हमारे पास दो तरह की कॉल आती है, एक तो एनजीओ की कॉल आती है जिसमें एनजीओ पहले से ही मृतक के परिजनों को प्रेरित करके नेत्रदान की सहमति ले चुका होता है, हमें बस जाकर नेत्र की जांच करके यह पता लगाना होता है कि नेत्र उत्सर्जित करने लायक है या नहीं। हम लोग नेत्र उत्सर्जित कर लेते हैं। दूसरी कॉल हमें अस्पतालों से आती है जैसे किसी की अस्पताल में मृत्यु हो गई तो हम अस्पताल में जाकर मतृक की आखों को चेक करते हैं यदि मृतक के नेत्र उत्सर्जिक करने लायक होते हैं तो बाद में हम मृतक के परिजनों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करते हैं। यदि परिजनों की सहमति मिल जाती है तो नेत्र उत्सर्जित किए जाते हैं।
एन्टी मिडिय़ा सोल्यूशन में कोर्निया को सेफ रखते हैं। इस सोल्यूशन में कोर्निया 4 दिन तक सुरक्षित रहता है। इसी दौरान हम लोग जयपुर के आई बैंक ऑफ सोसायटी राजस्थान में भेज देते हैं जहां मेडिकल डायरेक्टर्स इन कार्निया की जांच करते हैं। इसमें इनकी गुणवत्ता की जांच की जाती है और यह पता किया जाता है कि यह कोर्निया किस उम्र के व्यक्ति के लगाया जा सकता है। वैसे बैसिकली यदि 55 वर्ष आयु के व्यक्ति के कार्निया उत्सर्जित किया गया हो तो वह कम से कम 48 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्ति के प्रत्यारोपित किया जा सकता है उससे छोटे के नहीं।


सुनिलकुमार शर्मा, आई डेन्ट टेक्निशियन, रामस्नेही अस्पताल, भीलवाड़ा

नेत्र उत्सर्जित करने के लिए गर्मी में मृत्यु से 6 घंटे के भीतर और सर्दी और बारिश के सीजन में मृत्यु से 8 घण्टे के भीतर नेत्र उत्सर्जित किये जा सकते हैं।
नेत्र उत्सर्जित करने से पहले एनजीओ मृतक के परिजनों को प्रेरित करके नेत्रदान की सहमति ले चुका होता है। हमें बस जाकर नेत्र की जांच करके यह पता लगाना होता है कि नेत्र उत्सर्जित करने लायक है या नहीं है तो हम लोग नेत्र उत्सर्जित कर लेते हैं। दूसरी कॉल हमें अस्पतालों से आती है जैसे किसी की अस्पताल में मृत्यु हो गई तो हम अस्पताल में जाकर मतृक की आखों को चैक करते है यदि मृतक के नेत्र उत्सर्जिक करने लायक होते हैं तो बाद में हम मृतक के परिजनों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करते हैं उन्हें बताते हैं कि इनका शरीर तो अब खत्म हो चुका है आप इनका दाह संस्कार कर देंगे यदि आप चाहें तो इनके नेत्रों को दान करके किन्ही दो लोगों की जिंदगी रोशन कर सकते हैं, उसके बाद परिजन तैयार हो जाते हैं।
एन्टी मिडिय़ा सोल्यूशन में कोर्निया को सैफ रखते हैं इस सोल्यूशन में कोर्निया 4 दिन तक सेफ रहता है। इसी दौरान ये कार्नियां जरूरतमंदों को प्रत्यारोपित कर दी जाती है। अब तक सभी प्रत्यारोपण सफल रहे हैं।


भरतकुमार शर्मा, आई बैंक इंचार्ज, जेएलएन, अजमेर

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