नेत्रदान : एक साहसिक कार्य

निश्चित ही इन स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारियों के समक्ष दो स्थितियां एक साथ जूझ रही होती हैं। अव्वल तो यह कि किसी मृतक के घर जाकर परिजनों को ढांढस बंधाना और दूसरा उस नेत्रविहीन लोगों की पीड़ा को महसूस करना।
बिजयनगर जैसे छोटे शहर में नेत्रदान के लिए प्रेरित करने वाली सामाजिक संस्थाएं वाकर्ई एक नई मिसाल पेश कर रही हैं। मृतक के परिजनों को सांत्वना (ढाढस) देने के बाद उस स्थिति में नेत्रदान की चर्चा कर उनसे सहमति लेना कोई आसान कार्य नहीं। निश्चित ही इन स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारियों के समक्ष दो स्थितियां एक साथ जूझ रही होती हैं। अव्वल तो यह कि किसी मृतक के घर जाकर परिजनों को ढांढस बंधाना और दूसरा उस नेत्रविहीन लोगों की पीड़ा को महसूस करना।

जिस देश और समाज में मृत शरीर (पार्थिव शरीर) को भी पूरा सम्मान दिया जाता है, वहां किसी को नेत्रदान करने के लिए प्रेरित करना कम साहस का कार्य नहीं। बिजयनगर में लायंस क्लब बिजयनगर, लायंस क्लब क्लासिक, जैन सोश्यल ग्रुप, प्राज्ञ जैन युवा मंडल, भारत विकास परिषद, लायंस क्लब ‘रायलÓ जैसी संस्थाएं समय रहते पहल कर मृतक के परिजनों को नेत्रदान करवाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका यह कार्य काबिले तारीफ है। इस पुनीत कार्य में जुटे सभी कार्यकर्ता व पदाधिकारी बधाई के पात्र हैं। ठीक इसी तरह वे परिजन भी बधाई के पात्र हैं जो अपने को खोने के गम के बावजूद आंखें दान देने के लिए हामी भरते हैं।

साहब, पैर में कांटा भी चुभ जाए तो उसे निकालने में दर्द महसूस होता है। फिर, मृतक ही सही, पार्थिव शरीर से नेत्रदान करने के लिए हामी भरना भी साहस है। इसकी प्रशंसा तो की ही जानी चाहिए प्रेरणा भी लेनी चाहिए। इस सब के बावजूद कोई नेत्रविहीन व्यक्ति जब किसी की दान की हुई आंखों से दुनिया देखता है तो उसके चेहरे की मुस्कान देख सारी पीड़ा दूर हो जाती है। वह मुस्कान अनमोल है। नेत्रदान में अपनी भागीदारी निभाइये, किसी नेत्रविहीन व्यक्ति के चेहरे पर अनमोल मुस्कान के लिए। एक बार पुन: नेत्रदान जैसे पुनीत कार्य में लगे
सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को बधाई…।

– जय एस. चौहान –

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