पानी: वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी

भीषण गर्मी में लोगों को हलक तर करने के लिए पसीने बहाने पड़ रहे हैं, … और जलदाय विभाग के अधिकारी और जनप्रतिनिधि ‘बहाने’ बनाकर पेयजल समस्या को टाल रहे हैं। इस बहानेबाजी में जनता का कंठ सूख रहा है।

गुलाबपुरा में पानी के लिए लोग इन दिनों हलकान हैं। भीषण गर्मी में लोगों को हलक तर करने के लिए पसीने बहाने पड़ रहे हैं, … और जलदाय विभाग के अधिकारी और जनप्रतिनिधि ‘बहाने’ बनाकर पेयजल समस्या को टाल रहे हैं। इस बहानेबाजी में आम जनता का कंठ सूख रहा है। हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, लेकिन सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिल रहा। गत दिनों महिलाओं ने इसी मुद्दे पर आन्दोलन भी किया था लेकिन जलदाय विभाग ने वैकल्पिक व्यवस्था ढूंढने के बजाय चादर तान कर सो गया।

पेयजल की समस्या जस की तस है। लोगों का सब्र और जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों- के वादे टूट रहे हैं। स्थाई समाधान ढूंढे नहीं जा रहे। जबकि हालात को देखते हुए पेयजल आपूर्ति की वैकल्पिक व्यवस्था नितांत जरूरी है। दूसरी बात, गुलाबपुरा में पानी भी एक सियासी मुद्दा हो गया है। अव्वल तो यह कि नगर पालिका प्रशासन ने गर्मी के सीजन में चार महीने का पानी का बिल स्वयं भरने का वादा किया था। यदि कॉलोनियों में सप्ताह में जलापूर्ति की जा रही है तो चार महीने में 16 सप्ताह हुए।

यानि की 16 दिन जलापूर्ति करने के बाद चार महीने का बिल जमा किया जा रहा है। सवाल यहां चार महीने का पानी का बिल जमा करने का नहीं है, यहां सवाल निर्धारित समय पर और नियमित जलापूर्ति का है। आखिर तीन सौ से 350 रुपए प्रति टैंकर पानी खरीदने वाले उपभोक्ताओं को पानी का बिल चुकता करने में क्या परेशानी हो सकती है। गत वर्ष भी यही स्थिति थी लेकिन उससे कुछ सबक नहीं लिया गया।

चार वर्ष पूर्व गर्मी के दिनों में टैंकरों से जलापूर्ति की गई। लेकिन इस बार अब तक विचार ही किया जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नगर पालिका प्रशासन आम जनता का हलक तर करने के लिए जल्द से जल्द कोई वैकल्पिक व्यवस्था करेगा। इसके बावजूद, स्थाई समाधान तो जरूरी है…।
जय एस. चौहान

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