मलक्का जलडमरूमध्य में चीन की घेराबंदी करके मोदी दिल्ली लाैटे

नई दिल्ली। (वार्ता) हिन्द प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मलक्का जलडमरूमध्य के दोनों ओर बसे इंडोनेशिया एवं सिंगापुर के साथ बेहद अहम रक्षा समझौतों के साथ चीन की घेराबंदी करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तीन देशों की यात्रा पूरी करके आज शाम स्वदेश लौट आये।

श्री मोदी ने सिंगापुर से दोपहर से रवाना होने से पहले सिम्बैक्स के 25वें वर्ष के मौके पर चांगी नौसैनिक अड्डे का दौरा किया और भारत और सिंगापुर की नौसेनाओं को बधाई दी। वह भारतीय नौसेना के पोत आईएनएस सतपुड़ा पर गये और भारतीय नौसैनिकों से भेंट की। उन्होंने सिंगापुर के नौसैनिक अधिकारियों से भी अलग से भेंट की। इसके बाद वह स्वदेश रवाना हुए थे। श्री मोदी 29 मई को इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता पहुंचे थे और 31 मई को मलेशिया में संक्षिप्त प्रवास पर वहां के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद से भेंट करके सिंगापुर पहुंचे थे। श्री मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो और सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सीन लूंग के साथ द्विपक्षीय बैठकों में रक्षा एवं आर्थिक सहयोग के कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये।

इंडोनेशिया में 30 मई को श्री मोदी एवं श्री विडोडो की द्विपक्षीय शिखर बैठक में भारत और इंडाेनेशिया ने अपने रक्षा सहयोग समझौते का नवीनीकरण करने के साथ ही अंतरिक्ष, रेलवे, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के 15 करारों पर हस्ताक्षर किये थे। भारत ने मलक्का जलडमरूमध्य के निकट सबांग द्वीप पर विशेष आर्थिक प्रक्षेत्र में निवेश के करार पर भी हस्ताक्षर किये हैं। इंडोनेशिया ने मई की शुरुआत में भारत को सबांग में निवेश की इजाज़त दी है। हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती पैठ ने भारत और इंडोनेशिया की चिंता बढ़ा दी थी और इसी वजह से सबांग को लेकर सहमति बनी है। खास बात यह है कि सबांग बंदरगाह में 40 मीटर की गहराई होगी जो पनडुब्बी समेत किसी भी तरह के जहाज़ के लिए मुफ़ीद होगी।

इसी प्रकार से सिंगापुर में श्री मोदी एवं श्री ली सीन लूंग के साथ बैठक में दोनों नौसेनाओं के बीच लॉजिस्टिक सहयोग और आतंकवाद के मुकाबले के लिए साइबर सुरक्षा सहयोग सहित सात समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये और समग्र आर्थिक सहयोग समझौते की दूसरी समीक्षा पूरी करके इसके उन्नयन की घोषणा की गयी। नौसेनाओं के बीच समझौते में नौसैनिक पोतों, पनडुब्बियों एवं नौसैनिक विमानों के एक-दूसरे के यहां आवागमन, समन्वय, लॉजिस्टिक एवं सर्विस सपोर्ट के करार का क्रियान्वयन शामिल है। इस मौके पर श्री मोदी ने कहा कि दोनों देशों ने अपनी सामरिक साझेदारी में रक्षा और सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया है। हम इन संबंधों में लगातार वृद्धि का स्वागत करते हैं। उन्होंने कहा, “शीघ्र ही हम त्रिपक्षीय नौसैनिक अभ्यास भी शुरू करेंगे। बार-बार होने वाले अभ्यासों तथा नौसैनिक सहयोग को ध्यान में रखते हुए नौसेनाओं के बीच लॉजिस्टिक समझौता संपन्न होने का भी मैं स्वागत करता हूं।”

चीन की घेराबंदी के लिहाज से दो अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं सिंगापुर से सटे और मलक्का जलडमरूमध्य में सक्रिय मलेशिया के नये नेतृत्व के तालमेल दुरुस्त रखने की कवायद के तहत संक्षिप्त प्रवास पर कुआलालंपुर रुकना और नये प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद से मिलना रहा। दोनों नेताओं के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने बताया कि रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत करने को लेकर दोनों नेताओं के बीच सार्थक वैचारिक आदान प्रदान हुअा। वहीं मलेशिया के विदेश मंत्रालय ‘विस्मा पुत्र’ ने कहा कि बैठक में भारत एवं मलेशिया के बीच हज़ारों साल पुराने रिश्तों की आधारभूत शक्ति को रेखांकित किया गया। इस यात्रा से दोनों देशों की हमारी रणनीतिक साझेदारी को और मज़बूत करने की दृढ़ प्रतिबद्धता का पता चला है।

सिंगापुर में हिन्द प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा एवं शांति के विषयवस्तु पर आधारित शांगरी ला डॉयलॉग में श्री मोदी ने भारत के दर्शन को सामने रखा और चीन को दक्षिण चीन सागर में टकराव से बचकर सहयोग के रास्ते पर आने का संदेश देते हुए कहा, “भारत और चीन ने आपसी मुद्दों को निपटाने और सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए काफी परिपक्वता दिखाई है।’ श्री मोदी ने कहा कि वर्तमान सदी एशिया की बनानी है तो प्रतिद्वन्द्विता का रास्ता छोड़कर सहयोग के साथ बढ़ना होगा। उन्हाेंने कहा, “एशिया की ‘प्रतिद्वंद्विता’ क्षेत्र को पीछे धकेल देगी, जबकि सहयोग इसे सही आकार देगा।” उन्होंने कहा “एशिया और दुनिया का अच्छा भविष्य होगा, यदि भारत और चीन भरोसे और आत्मविश्वास के साथ मिलकर काम करें।”

श्री मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई अनौपचारिक बातचीत के बाद उनका यह बयान कूटनीतिक जगत में बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस बीच हिन्द प्रशांत क्षेत्र को लेकर अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस की प्रधानमंत्री श्री मोदी से मुलाकात को भी इसी कड़ी में देखा जा रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार के अनुसार श्री मोदी और श्री मैटिस की बातचीत हिन्द प्रशांत क्षेत्र पर प्रधानमंत्री के व्याख्यान के संदर्भ में हुई है। करीब एक घंटे तक एकांत में हुई बातचीत के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी मौजूद थे।

बाद में श्री मैटिस ने अपने संबोधन में भी हिन्द प्रशांत क्षेत्र को लेकर श्री मोदी के विचारों का अनुमोदन किया आैर भारत की प्रमुख भूमिका को रेखांकित किया। श्री मैटिस ने अमेरिकी नौसेना की एशिया प्रशांत कमान का नाम हिन्द प्रशांत कमान किये जाने के बारे में सवालों के जवाब में कहा कि ट्रंप प्रशासन ने एशिया प्रशांत क्षेत्र की जगह ‘स्वतंत्र एवं खुले हिन्द प्रशांत क्षेत्र’ शब्द का प्रयोग भारत की भूमिका को मान्यता देने के लिए शुरू किया है। उन्होंने कहा कि जैसा कि हमने अभी देखा है कि हिंद महासागर में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत अपनी आर्थिक प्रगति के साथ स्वत: ही प्रमुख भूमिका में आ रहा है। हमें यह पहचानने की जरूरत है कि हिंद महासागर और भारतीय उपमहाद्वीप में भारत का महत्व निश्चित रूप से बढ़ रहा है।

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