मिठाई के बादशाह भंवरजी नहीं रहे

बिजयनगर। बिजयनगर निवासियों का मुंह मीठा कराने वाले या यूं कहें कि बिजयनगर के लोगों को मिठाई का चस्का लगाने वाले भंवरजी अब हमारे बीच नहीं रहे। मिठाई के बादशाह हलवाई भंवरजी ने 15 जून को अंतिम सांसें ली। उनके निधन के समाचार मिलते ही पूरे कस्बे में शोक की लहर फैल गई। वे 91 वर्ष के थे तथा पिछले 30 वर्षों से गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भी संन्यासी जैसा जीवन जी रहे थे। इसी के दृष्टिगत उनकी बैकुण्ठी निकाली गई। उनके अंतिम संस्कार में कस्बे के माली समाज सहित 36 ही कौमों के आम और खास लोगों ने शरीक होकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजली अर्पित की।

बिजयनगर में मिठाई के पर्याय थे भंवरजी
कस्बे में यदि मिष्ठान की बात चले और उसमें भंवरजी हलवाई का जिक्र न हो यह संभव नहीं। मूलत: ब्यावर के रहने वाले भंवरजी 1951 में बिजयनगर आए थे तब उनकी उम्र मात्र 22 वर्ष थी। उन्होंने यहां आकर सबसे पहले सिर पर टोकरा रखकर पानी पताशे व नमकीन बेचकर अथक परिश्रम किया। कुछ पैसे जमा करने के बाद वे अपने जीजा हनुमान प्रसाद को भी यहां ले आए। आज जहां भंवरलाल मंगलप्रसाद नामक प्रतिष्ठित मिठाई की दुकान है, उस दुकान को पुत्र मंगलप्रसाद और भानजे बस्तीराम के नाम से भंवरलालजी ने 1960 में शुभारम्भ किया।

इसके बाद 9 साल तक साले-जीजे की जोड़ी ने मिठाई की दुनिया में कस्बे सहित आसपास के गांवों में अपनी ख्याति फैलाई। इसके बाद 1969 में दोनों साले जीजा अलग-अलग हो गए। इस पर भंवरजी ने अपनी दुकान का नाम बदलकर भंवरलाल मंगलप्रसाद (लाला भाई) कर दिया। वहीं उनके जीजा हनुमान प्रसाद ने विवेकानन्द चौक के समीप उनके पुत्र कालूराम बस्तीराम के नाम से मिठाई की दुकान खोल दी।

हनुमान प्रसाद वर्षों पूर्व इस दुनिया से विदा हो गए। साले जीजा की इस जोड़ी ने कस्बे सहित आस-पास के गांवों में मिठाई की गुणवत्ता को लेकर ऐसी धूम मचाई कि आज दोनों के परिवारों का मुख्य व्यवसाय मिठाई ही बना हुआ है तथा आज भी भंवर जी हलवाई और कालूराम बस्तीराम हलवाई के गुलाब जामुन की मिठास कस्बे ही नहीं अपितु देश-विदेश तक पहुंच चुकी है।

त्याग की मिसाल थे
कोई भी व्यापारी जब तक उसका व्यापार तेजी पर हो और शरीर साथ देता हो तब तक वह व्यापार करना नहीं छोड़ता। इसके उलट भंवरजी को पैसे से लगाव जैसे छूटता चला गया और अपने मिठाई के व्यापार की कमान अपने दोनों बेटों मंगलप्रसाद व यशवंत कुमार को सौंप दी। इसके बाद वे अध्यात्म में लीन हो गए तथा पीछे मुड़कर कभी उन्होंने व्यापार की तरफ नहीं देखा।

भरा-पूरा परिवार छोड़ गए
भंवरजी अपने पीछे दो पुत्र मंगप्रसाद (लालाभाई) यशवंत (बीरा), छह पुत्रियों समेत तीन पौत्र व तीन पौत्रियां व एक प्रपौत्री सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

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