कर्म बढ़ाने में मित्र की बात मानते हो, कर्म घटाने में संत की बात नही मानते: योगेश मुनि

बिजयनगर। (खारीतट सन्देश) स्थानीय स्वाध्याय भवन में शुक्रवार को धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए परम पूज्य श्रद्धेय श्री योगेश मुनि जी म.सा. ने कहा कि संसार के समस्त प्राणियों के मोक्ष एवं मोह के क्षय का का मार्ग दिखलाने वाले अनन्त उपकारी वीतराग भगवन् को वन्दन एवं उन्ही के पदचिन्हों पर चलने वाले साधना में प्रतिफल तत्पर रहने वाले आचार्य भगवन् के चरणों में शत-शत वन्दन धर्मानुरागी भव्य आत्माओं जिनवाणी हमें बता रही है कि स्वयं अपने ही प्रपंच में मकड़ी के जाल की भांति उलझे है स्वयं को ही निकलना है। प्रवचन सभा में हमें अपने कान को प्रसन्न नही अपितु प्राण को प्रसन्न करना है। क्रोध बोध को समाप्त कर देता है। आवेश में कभी कोई निर्णय नही लेना है। प्रेम से अलग होना अलग बात है। कर्म बढ़ाने में मित्र की बात मान लेते हो परन्तु कर्म घटाने के लिये संत की बात नही मानते हो।

क्रोध और खुशी में सदैव संयम रखना है। खुशी में कभी कोई वचन नही देता है इसी चक्कर में राजा दशरथ ने कैकयी को दो वचन दे डाले इसके परिणामस्वरूप राम का वनवास जाना पड़ा। संसार में भटकना और अटकना नही है तो वीतराग वाणी ही सर्वश्रेष्ठ है वरना रामायण और महाभारत हमारे जीवन में चलती रहेगी। सबसे बड़ी परीक्षा है कि क्रोध और खुशी मौन रह सके जो कि बड़ा दुश्कर कार्य हैं। घर में दुखिया और समाज में मुखिया बना हुआ है। चव्वनी तो चल रही है और रूपया चला रहे है। घर शांत होगा तभी घर में शांति होगी। ज्ञानियों में हमें बताया कि सबसे दुर्लभ ‘मानव भव’ पंचेन्द्रिय जीव में मनुष्य भव में ‘जीम’ को सबसे प्रमुखता दी हैं। मानवभव को सकल बनाने के लिये उपरोक्त दो सूत्रों को अपनाकर आत्मसात् करे तो निश्चित ही जीवन यात्रा सफलता की आर अग्रसर होगी।

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