शिवकृपा पाने का उत्तम मास है सावन

बिजयनगर। बारह महिनों में श्रावण का महीना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। देवों के देव महादेव की पूजा-अर्चना करने का सर्वोत्तम मास है सावन। पुराणों व अन्य ग्रंथों में श्रावण और श्रावण के महत्व की कई कथाएं प्रचलित हैं। प्रस्तुत है एक संकलन….
पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव श्रावण माह में स्वयं अवतरित होकर अपने ससुराल गए। वहां उनका स्वागत अघ्र्य एवं जलाभिषेक से किया गया। इस कथा के आधार पर श्रावण मास में शिव लिंग पर जल चढ़ाने की परम्परा चल पड़ी। माना जाता है कि अब भी प्रतिवर्ष श्रावण मास में भगवान शिव अपने ससुराल ‘हिमालय’ पर आते हैं एवं एक मास ससुराल में निवास करते हैं। जिसका प्रमाण आज भी अमरनाथ में ‘बर्फ के शिवलिंग’ निर्मित होने से मिलता है। जो श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को तिरोहित हो जाता है। शिवकृपा पाने का यह उत्तम समय है।
श्रावण में ही हुआ था समुद्र मंथन
पुराणों के अनुसार श्रावण मास में समुद्र मंथन हुआ। मंथन के बाद हलाहल विष निकला, जिसे शिवजी ने अपने कंठ में समाहित करके सृष्टि की रक्षा की। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया। उनका नाम नीलकंठ हो गया। विष के प्रभाव को कम करने के लिए इन्द्रदेव ने श्रावण में घनघोर वर्षा करना आरम्भ किया और सभी देवताओं ने जलाभिषेक आरम्भ किया।

इस माह में जल का स्राव निरन्तर होता है। अत: इस मास को श्रावण मास के नाम से पुकारा जाने लगा। इसलिए श्रावण मास में शिवजी को जल चढ़ाने का अधिक महत्व है। पुराणों के आधार पर आषाढ़ शुक्ला एकादशी से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं। अत: यह समय कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भक्तों, साधु संतों एवं समस्त लोकवासियों के लिए बड़ा अमूल्य है। यह चार मास तक होने वाला एक वैदिक यज्ञ है। इसे ‘चौमासे’ के नाम से भी पुकारते हैं। इस अवधि में सृष्टि के संचालक का कार्य भगवान शिव ग्रहण करते हैं। अत: श्रावण के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं।
मार्कंडेय ने की थी सावन में शिव की पूजा
मार्कंडेय पुराण के अनुसार ‘मरकंडू ऋषि’ के पुत्र मार्कंडेय ने श्रावण महीने में भगवान शिव की घोर तपस्या की। भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उन्हें कई दिव्य मंत्र शक्यिां प्रदान की। उन मंत्र शक्तियों के सामने स्वयं मृत्यु के देवता यमराज भी नतमस्तक हो गए। अत: श्रावण मास में शिव की पूजा अर्चना एवं व्रत उपवास की परम्परा चल गई। इसी तरह शिव पुराण में उल्लेख है कि शिव स्वयं जल है। अत: जल से शिवाभिषेक करने का उत्तमोत्तम फल प्राप्त होता है।
सावन में सोमवार का महत्व
श्रावण मास का आरम्भ 28 जुलाई से हो रहा है। इसकी समाप्ति 26 अगस्त को होगी। इस वर्ष श्रावण में चार सोमवार हैं। पुराणों के आधार पर पार्वती अपने पिता के यज्ञ में बिना बुलाई गई। अपमानित होने पर यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया। पुनर्जन्म में पुन: भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए ‘श्रावण के सोमवार’ के व्रत किए। जिससे पुनर्जन्म में ‘सती’ ने पुन: ‘शिव’ को पति के रूप में प्राप्त कर लिया। तभी से कन्याओं और महिलाओं में श्रावण के सोमवार के व्रत करने की परम्परा चल गई। मनचाहा पति के लिए कुंवारी कन्याएं सावन के सोमवार को शिव की पूजा करती हैं।
चन्द्र ग्रहण की गणना
इस वर्ष आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण होगा। इसी दिन गरुपूर्णिमा भी है। इस ग्रहण का सूतक 28 जुलाई को दिन में 2 बजकर 55 मिनट से मान्य होगा। ग्रहण का स्पर्श रात्रि 11 बजकर 55 मिनट से मान्य होगा। ग्रहण का मोक्ष शुद्धि काल रात्रि 3 बजकर 49 मिनट पर होगा। यह ग्रहण सेनानायक, मंत्री, धर्मनेता, कथावाचक, कर्मकारी पंडित एवं उद्योगपति और प्रशासकजनों के लिए अशुभ फलदायी रहेगा। इसके अलावा यह ग्रहण बाढ़, अतिवृष्टि तथा दुर्घटनाकारक रहेगा। समुद्री तूफान से भी जनजीवन प्रभावित होगा। इसके अनिष्ट प्रभाव से भारत प्रभावित होगा।
पं. रामगोपाल शर्मा, गुलाबपुरा

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