गुरु के चरणों में ही मिलती है संयम की रक्षा और सुरक्षा

बिजयनगर। महान तत्व चिंतक प्रमोद मुनिजी म.सा. एवं योगेश मुनिजी म.सा. इन दिनों स्थानीय महावीर भवन में धर्मसभा में श्रावकों को धर्म और धर्म के विविध पहलुओं की बारीकियां समझा रहे हैं। श्रावकों को आत्मोत्थान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जिनवाणी के विविध आयामों से श्रावकों को पुरुषार्थ और परमार्थ, संयम और तप, मोह और मोक्ष के बारे में अपनी दृष्टि से अवगत करा रहे हैं। दूर-दूर से आने वाले श्रावक यहां पूरे मनोभाव से धर्मसभा का लाभ ले रहे हैं।
26 जुलाई का प्रवचन
तत्व चिंतक प्रमोद मुनि एवं योगेश मुनि ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि जीवन में प्रारम्भ नहीं, प्रवास महत्वपूर्ण होता है। किसी भी कार्य के प्रारम्भ में जो जोश हम दिखाते है मात्र इससे लक्ष्य प्राप्ति नही होती अपितु इसे अन्त तक कायम रखना जरूरी है। ‘प्रारम्भ’ में ही नही ठहरना है। साल के 12 महीनों में वर्षावास का विशेष महत्व है। यह मास जीवनदायिनी है। मुनिवृंद ने ‘गाय-गुरू-ग्रन्थ’ को भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताया। उन्होंने कहा कि श्रम-संयम-सदाचार-शरीर के अभिमान का त्याग ही धर्म है। धर्म हमारे जीवन का प्राण है। हम इसे भूल रहे हैं हमारे स्वास्थ्य खान-पान सब दूषित हो रहे हैं। इस कारण शाही रोग ‘ब्लड प्रेशर-शुगर-थायराइड’ बढ़ रहे हैं। ‘होटल’ हो सके तो टालें वरना विनाश होगा टोटल, … और जाना पड़ेगा हॉस्पीटल। इसलिए बाहर का खाना छोडऩा ही श्रेयस्कर है।
27 जुलाई का प्रवचन
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि संयम की रक्षा और सुरक्षा ‘गुरु’ के चरणों में ही प्राप्त होती है। गुरु हमारे अभिमान को तोड़ता है हमें गिरने से बचाता है और संसार सागर से पार कराता है। हमें गुरु को गांव या घर में नही अपितु ‘घट’ में बसाना है। आध्यात्म की कोई यदि परिभाषा है तो वह है ‘गुरु’। गरु हमें तीन प्रकार के दान देते हैं, सम्यक्त्व का दान, सद्गुणों का दान और समाधि का दान। ‘गुरुदेव’ 4 अक्षर है जो चारों गतियों का नाश कराते हैं। गुरु हमारे गुनाह होने पर भी रूष्ट नही होते, गुणों से परिचय कराते हैं। राजा के यहां दासी का, रिश्तों में मौसी का, ज्योतिष में राशि का और जीवन में गुरु का विशेष महत्व होता है।
29 जुलाई का प्रवचन
योगेश मुनि ने धर्मसभा में कहा कि मानव तू अपने इस शरीर की जितनी फिक्र कर रहा है उससे अनन्त गुना फिक्र तुझे अपनी आत्मा की करनी है एक भव में अनन्त भवों को काटना है ऐसा सद्पुरुषार्थ तुझे करना है। हर पल यह ध्यान चाहिए कि मुझे अपनी वर्तमान निर्दोषता का शुद्ध रखना है, सुरक्षित रखना है। इस धरा पर तीन उपकारी जिन्हें कभी नही भूलना है। मुनि ने कहा कि जिस प्रकार जीवन में मां नहीं बदली जा सकती और उसी प्रकार गुरु भी नहीं बदला जा सकता है। प्रवचन में प्रमोद मुनि जी म.सा. बड़े ही मार्मिक भावों से हर दिन हृदय की असीम आस्था के साथ प्रतिदिन अपना करूणामय वाणी से स्वयं स्वाध्याय करते है और साथ ही हमें संसार तारने वाली बातों से प्रतिदिन अवगत कराते हैं।
30 जुलाई का प्रवचन
मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि संयोग-वियोग से मुक्त परमात्मा एवं उन्हीं के द्वारा प्ररूपित दयामय धर्म पर चलकर निरन्तर अपनी साधना में अग्रसर हो रहे आचार्य एवं साधु भगवन्तों के चरणों में सविधि वंदन करने के पश्चात् हे देवानुप्रियो उपकारियों के उपकार के स्मरण मात्र में हमारे भव भ्रमण कर जाते हैं। वर्षावास में हम सभी ‘उत्तराध्यन सूत्र’ (जिसे आचार्य हस्तीमल जी म.सा. ने जिनशासन की गीता बताया) के 23वें अध्ययन ‘कैसी-गौतम संवाद’ पर विशेष चर्चा करेंगे। ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ किसे कहते हैं। ‘उत्तर’ यानि श्रेष्ठ या समाधान या दिशा भी है जो शास्वत है। भगवान की यह अंतिम वाणी जीवन की हर समस्या का समाधान है। गौतम स्वामी भगवान महावीर और केसी स्वामी भगवान पाश्र्वनाथ के समय के थे। उनकी चर्चा जो हुई वहा हमें चर्या का सन्देश देती है। उन में मतभेद था पर मनभेद नहीं था। यदि मन का भेद ना हो और मतभेद हो तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए मन में भले ही खेद रख लेना पर मनभेद मत रखना। उन्होंने कहा कि जहां अनुराग होता है वहां अनुमोदना होती है। ‘राग’ खराब, अनुराग अच्छा है, इसके बिना अहम् नहीं छूटेगा।
31 जुलाई का प्रवचन
मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि जो भव्य जीव जिनवाणी का आदर करे वह कभी भी दर-दर नही भटकता। व्यवस्था
ही घर की शोभा है। आप पोतियों और मोतियों से मोह रखते हो जहां तक उचित है परन्तु ‘जूतियों’ से क्या मोह। पुद्गल में तेरी आस्था या स्वामित्व भाव रखता है परन्तु ज्ञानियों की नजर में तू ‘गुलाम’ है। श्रद्धेय प्रमोद मुनि ने आप सभी भावुक है। उत्साह उमंग के साथ आ रहे हैं, परन्तु मात्र इससे काम नहीं चलने वाला, ‘जागो-जागो’, आगे बढ़ो, सुनार की टुक-टुक में काम नहीं चलने वाला, लुहार की दो और आगे बढ़ो। सथाना बाजार स्थित ‘जैन लाईबे्ररी’ की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि महासति कमलप्रभाजी म.सा. का इसमें श्रम उत्तम है।

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