रोटी की भूख को शांत हो जाती है लेकिन नाम की भूख शांत नही होती: प्रमोदमुनि

बिजयनगर। स्थानीय महावीर भवन में आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए परम पूज्य श्रद्धेय प्रमोदमुनि जी म.सा. एवं मधुर वक्ता श्री योगेश मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि वीतराग भगवान तीनों लोकों में पूजित होते है एक राजा अपने देश में, धनवान जहां रहता है वहां पूंजितता है और विद्वान की सर्वत्र पूजा होती है परन्तु वीतराग भगवन तो ‘सुर-असुर-नर’ तीनों में वन्दनीय और पूजनीय होते है। वीतराग भगवान के जन्म से विशिष्ट यश नाम कर्म का उदय होता है यश: एक दिशागामी और कीर्ति सर्व दिशागामी होती है यश उन्ही को मिलता है जिनको रस नही आता, निर्लिप्त होता है। यश के मोह ये रहित होता है।

रोटी की भूख एक हद तक शांत हो जाती है मगर ‘नाम’ की भूख कभी शांत नही होती है पूर्ण ज्ञानियों की पूजा अर्चना कर अपूर्णता को मिटाना है इस कार्य को करने के लिये भीतर में खलबली मचानी पड़ेगी। बाहरी साधना से जीवन की पूर्णता नही मिल सकती। इस संसार में 2 का ही राज चलता आया है। (1) मोहनीय कर्म (2) जिनराज मनुष्य भव अति दुर्लभ (अधिकतम 7 भव) है। जीव तू निगोद से सन्नी पंचेन्द्रिय बन गया अत: इस दुर्लभता में थोड़ा और पुरूषार्थ कर आगे बढ़। सिद्ध अवस्था में कोई ‘नाम’ नही है पर से सुख चाहना ही भोग है अत: भोग और उपभोग के चक्कर से निकलकर ‘पूर्णता’ (केवल ज्ञान दर्शन) जो अनन्त सुखों का वास है तेरे ही भीतर है। तू स्वयं अनन्त सुखों का भंडारी है और पुद्गल से सुख चाह रहा है। हे जीव, इन्द्रियों के सुख में धर्म नही हैं।

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