जुबान और जीवन का एक हो जाना ही जीवन की सार्थकता

बिजयनगर । महान तत्व चिंतक प्रमोद मुनिजी म.सा. एवं योगेश मुनिजी म.सा. इन दिनों स्थानीय रेलवे फाटक के निकट महावीर भवन में धर्मसभा में श्रावकों को धर्म और धर्म के विविध पहलुओं की बारीकियां समझा रहे हैं। श्रावकों को आत्मोत्थान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जिनवाणी के विविध आयामों से श्रावकों को पुरुषार्थ और परमार्थ, संयम और तप, मोह और मोक्ष के बारे में अपनी दृष्टि से अवगत करा रहे हैं। दूर-दूर से आने वाले श्रावक यहां पूरे मनोभाव से धर्मसभा का लाभ ले रहे हैं।
9 अगस्त का प्रवचन
महान चिंतक प्रमोद मुनिजी एवं योगेश मुनिजी म.सा. ने धर्मसभा कहा कि सम्बोध से सर्वज्ञ बनने वाले प्रभू पार्श्वनाथ ऐसे तीर्थंकर हैं जिनका सबसे छोटा शासनकाल रहा और सबसे ज्यादा जिनके जिनमंदिर है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया उसी तरह हमें भी ‘पुद्गलों आत्म प्रदेश छोड़ो’ अभियान चलाना चाहिए। धर्म स्वेच्छा से और शक्ति अनुसार जरूरी है। हमारी जुबान और जीवन एक हो जाए, यही हमारे जीवन की सार्थकता है। हर आत्मा में सर्वज्ञ बनने की योग्यता है। वचन और आचरण को श्रेष्ठ बनाना है। मुंह में राम, बगल में छुरी वाली प्रवृत्ति को हटाना है। दर्पण पर धूल है (कर्म रूपी) बस इसे हटाना है। यथावादी-तथाकारी बनना है। ‘कबिरा काया कूकरी, करत भजन में भंग’ दो टूकड़ा डाल के भजन करो निसंग।
10 अगस्त का प्रवचन
मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि भगवान की वाणी ‘आप्त’ कहलाती है आप्त अर्थात् जो अपनी आत्मा से जाने या जो सत्य और सत्व को प्रकट करे। हमें मलिनता का त्याग कर निर्मल बनना है जब तक दोस्ती (पुद्गल की) है, दोष आएंगे इनसे जुदा होते ही अलग फिजा होगी अलग अदा होगी। सूर्य थक सकता है, मिट नहीं सकता। उसी प्रकार आत्मा पे आवरण आ सकता है मिट नहीं सकती। मिटने वाले को अमिट मानकर अमिट नहीं बन सकते। उन्होंने कहा कि जो समय को ठुकराता है, वह दर-दर की ठोकरें खाता है। अनादिकाल की समस्या इस जन्म में मिट सकती है। समय में धन प्राप्त हो सकता है, मगर धन से समय प्राप्त नहीं हो सकता है।
11 अगस्त का प्रवचन
जिससे प्रीति होती है उसी की स्तुति होती है भागवान (पत्नी) की स्तुति अनेक बार की, अब भगवन् की स्तुति करें। केवली भगवन् हमें करोड़पति नहीं केवल्य का बोध कराने वाले हैं। सर्वज्ञ भगवन तीन गुणों के धारक होते हैं
(1) मैत्रितत्व – जिसने कर्मों का भेदन कर दिया। (2) ज्ञात्रित्व – जिसने ज्ञान प्राप्त कर लिया हो। (3) नैत्रित्व – धर्म संघ के नायक। परम पूज्य गुरुदेव हस्तीमलजी के गुरु आचार्य शोभाचन्द्रजी म.सा. का 92वां स्मृति दिवस के अवसर पर गुणानुवाद करते हुए मुनिवृंद ने कहा कि ‘रत्न संघ’ के ज्यादातर महापुरुष बाल ब्रह्मचारी थे और सभी ने संथारे सहित अमृत्व को पाया। जिस व्यक्ति को अकेलापन अखरता है तो संसार बसता है और अकेलापन निखरता है तो सन्यास बसता है।
12 अगस्त का प्रवचन
धर्मसभा में मुनिवृंद ने कहा कि हम हमेशा ये याद रखें कि खुदा से और खुद से कुछ छिपा नहीं है। परन्तु ये ध्यान रहे भगवान अनन्त चक्षु वाले हैं। आप भूलकर भी पाप ना करें। क्योंकि किया गया पाप और जाप निष्फल नहीं जाता है, वह एक न एक दिन अवश्य उदय में आता है। उन्होंने कहा कि पाप यदि बुलाने लगे, रूलाने लगे तो तुरन्त पाप को छोड़कर प्रभु को भजन चालू कर दो। करोगे पाप खाओगे धाप, करोगे धर्म बनोगे नरम, टूटेंगे करम। जब हम अकेले में हो तो भगवान् से बात करे, जब हम समूह में हो तो भगवान की बात करे, लक्ष्मी मिले भाग्य से भाग्या ना न मिले कोई, अपने दिन का हुजरा साफ कर उसको पाने के लिए, पाप का त्याग ही तीर्थ है।
13 अगस्त का प्रवचन
मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि हमारा यह अत्यंत सौभाग्य है कि जिनके आचरण में अहिंसा, अभिव्यक्ति में अनेकान्तवाद और जिनके वचन युक्तियुक्त शास्त्रों से अविरोधी है, ऐसे हमें अधूरे नही, पूरे भगवान मिलते हैं। जिनवाणी का आश्रय श्रवण से बस हमारे भीतर यह बीज प्रस्फुटित और प्रफुल्लित हो जाए ऐसा प्रयास करना है। संसार को तारने के लिए हमें एक नहीं अनेक औषधि (मार्ग) मिले हैं। प्रतिदिन हमें भी आपके माध्यम से हमें भी स्वाध्याय का लाभ मिल रहा है आपकी उपस्थिति और चित्त की स्थिरता प्रशंसनीय है चिंतन को सही दिशा प्रदान करने के लिए चर्चा को सही रूप से चर्चित करते हुए आप सभी साधको को भिन्न-भिन्न रूप में जिनवाणी प्रस्तुत की जा रही है। आपका चिंतन अनेक हो मगर आचरण एक होना चाहिए।
14 अगस्त का प्रवचन
मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि हमारा यह अत्यंत सौभाग्य है कि जिनके आचरण में अहिंसा, अभिव्यक्ति में अनेकान्तवाद और जिनके वचन युक्तियुक्त शास्त्रों से अविरोधी है, ऐसे हमें अधूरे नही, पूरे भगवान मिलते हैं। जिनवाणी का आश्रय श्रवण से बस हमारे भीतर यह बीज प्रस्फुटित और प्रफुल्लित हो जाए ऐसा प्रयास करना है। संसार को तारने के लिए हमें एक नहीं अनेक औषधि (मार्ग) मिले हैं। प्रतिदिन हमें भी आपके माध्यम से हमें भी स्वाध्याय का लाभ मिल रहा है आपकी उपस्थिति और चित्त की स्थिरता प्रशंसनीय है, चिंतन को सही दिशा प्रदान करने के लिए चर्चा को सही रूप से चर्चित करते हुए आप सभी साधकों को भिन्न-भिन्न रूप में जिनवाणी प्रस्तुत की जा रही है। आपका चिंतन अनेक हो मगर आचरण एक होना चाहिए।
15 अगस्त के दिन हमने अंग्रेजों को अपने देश भेजा
धर्मसभा में प्रमोद मुनि ने कहा कि ‘दृश्य पराधीनता को छोड़कर देश आज के दिन अदृश्य पराधीनता में चला गया। अंग्रेजों के जो-जो देश गुलाम रहे हैं वहीं क्रिकेट का खेल खेला जाता है, कही भी क्रिकेट नहीं खेला जाता। क्या हमें सच्चे अर्थो में आजादी मिली है स्वयं के विचार योग्य विषय है।‘ सच्चाई तो यह है कि हम हकीकत में स्वाधीनता और पराधीनता का मतलब ही नहीं जानते। जो छोड़ सकता है वही स्वाधीन है, पर से सुख चाहना पराधीनता स्वतंत्रता के लिये स्वतंत्र की शरण लेनी है। महाकवि तुलसीदास जी ने कहा कि पराधीन सपने सुख नाहि जननी और जन्मभूमि का दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना है। आचार्य श्री हस्ती कहा करते थे कि देश और राष्ट्र की रक्षा के लिए शस्त्र भी उठाना पड़े तो वह हिंसक कार्य नहीं। क्योकि राष्ट्र की सुरक्षा से ही हम और हमारा धर्म सुरक्षित रह पाता है। आजादी की लड़ाई में देश भक्तों ने आहूति दी है। हमें पराधीनता से पूर्ण स्वाधीन बनना है तो इन्द्रियों की दासता से मुक्ति ही सच्ची स्वतंत्रता होगी।

वीतराग ध्यान साधना शिविर शुरू
बिजयनगर। मंगलवार 14 अगस्त से गुरू भगवन्तों के शुभाशीष से दस दिवसीय वीतराग ध्यान साधना शिविर स्थानीय महाराजा पैलेस में प्रारम्भ हुआ। अनेक शिविर लगा चुकी महान् सुश्राविका श्री नेहा जी ने लगभग 58 की भर्ती की जिसमें अधिकांश बिजयनगर और आस-पास के क्षेत्र से हैं। प्रेरणा व इस सम्बंध में प्रबल पुरुषार्थ निहालचन्द सांड एवं पारसमल खटोड़ का रहा। शिविर श्री वर्धमान श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ बिजयनगर की ओर से लगाया गया है।

प्रथम दिन ध्यान में नेहा जी शिविर संयोजिका ने फरमाया कि आपके भीतर अनन्त शक्ति है, मूल (जड़) में जाने पर ही फूल खिल पाएगा। क्रिया करने में स्वाधीन हो गए पर भीतर में स्वाधीन नहीं है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नहीं अपितु अध्यात्म में डूबने के लिए आपको यहां ध्यान करवाया जा रहा है। इसमें स्वत: ही चेतना की धारा विभाव से स्वभाव में चलने लगेगी। हमारी लेश्याएं शुद्ध होती जाएंगी। अकर्ता भाव से साधना करनी है। भीतर का रसपान करने के लिए बाहर के रस का त्याग करना होगा। अत: जो खाली है वही भरा जा सकता है, ध्यान बहने की दशा है तैरने की नहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
Skip to toolbar