भक्त वह जो विभक्त नहीं हो- प्रमोद मुनिजी

बिजयनगर । महान तत्व चिंतक प्रमोद मुनिजी म.सा. एवं योगेश मुनिजी म.सा. इन दिनों स्थानीय रेलवे फाटक के निकट महावीर भवन में धर्मसभा में श्रावकों को धर्म और धर्म के विविध पहलुओं की बारीकियां समझा रहे हैं। श्रावकों को आत्मोत्थान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जिनवाणी के विविध आयामों से श्रावकों को पुरुषार्थ और परमार्थ, संयम और तप, मोह और मोक्ष के बारे में अपनी दृष्टि से अवगत करा रहे हैं। दूर-दूर से आने वाले श्रावक यहां पूरे मनोभाव से धर्मसभा का लाभ ले रहे हैं।
16 अगस्त का प्रवचन: तत्व चिंतक प्रमोद मुनिजी एवं श्री योगेश मुनिजी म.सा. ने धर्मसभा में कहा कि धर्मानुरागी मुमुक्षु बन्धुओं पाप का त्याग ही तीर्थ है। संसार में जितने भी धर्म है उनके पास तीर्थ है मगर जैन शासन के पास तीर्थ भी है और तीर्थंकर भी हैं। उन्होंने कहा कि कर्म के उदय से जीव तीर्थंकर और कर्म के क्षय से भगवान बन जाता है। तीर्थंकर का अतिशय कुछ ऐसा होता है कि उनके जन्म लेते ही कुछ क्षण के लिए तीनों लोकों में साता पहुंचती है। उत्कर्षठ रसायन आ जाए बस बेड़ा पार है उसके उदय में आते ही तीसरे भव में तीर्थंकर बन जाएगा। रुचि अर्थात् रस का आना और रसायन अर्थात् उसी के अनुसार तन-मन बन जाये (रस का गाढ़ा कर दे) या रस को लगातार भावना दे (एक-मेक कर दे) रसायन को औषध भी कहते हैं।

17 अगस्त का प्रवचन: मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि तीर्थंकर भगवान असाधारण विशेषताओं से युक्त होते हैं। इसलिए उनका अतिशय ही सबसे अलग व श्रेष्ठतम होता है। तीर्थंकर हमेशा मध्यरात्रि में ही जन्म लेते हैं ताकि मनुष्यों की बाधकता नहीं रहे। इंसानियत के मसीहा पूर्व सेठी अध्यक्ष परम आदरणीय डॉ. डी.आर. मेहता सा. पधारे श्रीमती एवं श्री राजीव जी डागा सा. ने हर्ष पैलेस बिजयनगर में भगवान महावीर विकलांग समिति द्वारा कैम्प लगाया उसका डी.आर. मेहता सा. ने उद्घाटन किया व पूज्य प्रमोदमुनि जी म.सा. से मांगलिक पाठ सुनने पधारे। आज इंसान धन वस्त्र अन्य वस्तुए दान करता है मगर ‘समय’ का दान सबसे बड़ा सदुपयोग है।

19 अगस्त का प्रवचन: मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि भगवान ने दो प्रकार के धर्म बताये है। (1) अगार धर्म (2) अणगार धर्म
अगार: भाष्यकारों ने बताया अग यानि जो नहीं चलता गमन नहीं करे (पहाड़) जो अग के आधार पर चलता है वह अगार है जो घर परिवार में रहते हुए धर्म करता है जब तक पूर्णता को उपलब्ध ना हो तब तक छोटा-छोटा धर्म जीवन को सीमित करते हुए करें। मेरू जितना पाप राई जितना हो सकता है, अगर श्रावक धर्म की पालना इमानदारी से करे।
अणगार: जो घर-बार से रहित होता है। साधु सर्प जैसा होता है क्योंकि वह अपना घर नहीं बनाता। वह अधिकार करता है मगर साधु सत्कार से ठहरता है। अर्थात् जो बंधन से मुक्त रहता है संत आपसे भी बढिय़ा मकान में रहते हैं मगर ममत्वभाव नहीं रखता।

21 अगस्त का प्रवचन: जिन किसे कहते हैं – जीतने वाला परिषद जेता, सकल कर्मों को जीतने वाला परिषह अर्थात् जो आगे होकर कष्टों को स्वीकार करे साधु भगवन्त 22 परिषह को जीतने वाले होते हैं। अनादि से ये जीव हंस-हंस कर कर्म बांध लेता है और रो-रो कर्म भुगतता है, इसका ठीक विपरित होना चाहिए। ऐसे जिनेन्द्र को भक्ति या अरे स्मरण करते रहने से हमें भी ऐसा सार्मथ्य प्राप्त हो सकता है जो जिसको ध्याता है उसी को पाता है। भक्त वह जो विभक्त नहीं हो या जो पुद्गुल से विभक्त है। भक्ति में भूख नहीं लगती। हमें तय करना है कि मुख्य किसे बनाए, भक्ति या भूख। हमें पर से सुख की चाहना को मिटाना है। बाहर का भगवान, भीतर से भगवान ही जीव में भगवान नजर आना शुरू हो जाए।

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