पानी में डूबते है तो मृत्यु और भक्ति में डूबते हैं तो मुक्ति

बिजयनगर । महान तत्व चिंतक प्रमोद मुनिजी म.सा. एवं योगेश मुनिजी म.सा. इन दिनों स्थानीय रेलवे फाटक के निकट महावीर भवन में धर्मसभा में श्रावकों को धर्म और धर्म के विविध पहलुओं की बारीकियां समझा रहे हैं। श्रावकों को आत्मोत्थान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जिनवाणी के विविध आयामों से श्रावकों को पुरुषार्थ और परमार्थ, संयम और तप, मोह और मोक्ष के बारे में अपनी दृष्टि से अवगत करा रहे हैं। दूर-दूर से आने वाले श्रावक यहां पूरे मनोभाव से धर्मसभा का लाभ ले रहे हैं।
22 अगस्त का प्रवचन
मुनिवृंद श्रद्धेय प्रमोदमुनि जी एवं योगेश मुनिजी ने कहा कि लोग यह सोचकर धर्म करते हैं कि उसके पाप धुल जाएं जैसे रात्रि में छिपकली जीवों को खाकर भगवान की तस्वीर के पीछे छिप जाती है। ऐसा करने से पाप कदापि नहीं धुलने वाला। पुदग्लों का सदुपयोग करते हुए हमें धर्म आराधना करनी चाहिए। हमें धर्म करना ही नहीं बल्कि धर्मी भी बनना है। उन्होंने कहा कि जहां ममत्व है वहा संसार है, जहां एकत्व है वहां मोक्ष है। हमें रूखा बनना है मगर व्यवहार रूखा नहीं होना चाहिए। बकरीद के अवसर पर आपने विशेष उद्बोधन देते हुए फरमाया कि –
जो मारता है उसे मरना पड़ेगा, जो काटता है उसे कटना पड़ेगा,
जो तड़पाता है उसे तड़पना पड़ेगा।
24 अगस्त का प्रवचन
धर्मसभा में मुनिवृंद ने कहा कि हालांकि मैं स्थानकवासी परम्परा से हूं पर जिस गच्छ सम्प्रदाय, पंथ में कोई अलौकिक पुरूष होता है तो मैं अत्यंत करूणा, उत्साह से भर जाता हूँ, मेरा रोम प्रफुल्लित हो जाता है और मैं उनका गुणगान करने में लग जाता हूं। ऐसे ही दिव्य पुरुष दिगम्बर परम्परा में आज आचार्य विद्यासागर जी म.सा. जिनके गुरु आचार्य ज्ञानसागरजी से वर्ष 30 जून 1968 को अजमेर दौलतबाग में दीक्षा पाई और 22 नवम्बर 1972 में आचार्य पद पाया। गुरु ने अपनी उम्र और अवस्था को देख जब उन्होंने आचार्य पद ग्रहण की बात की तब विद्यासागर जी ने साफ इंकार कर दिया। अन्त में नहीं मानने पर उन्होंने अपनी गुरु-दक्षिणा में यह बात मानने को कहा तब जाकर विद्यासागर जी माने।
25 अगस्त का प्रवचन
जीव का नैसर्गिक गुण है ‘प्रीति’ प्रभू से प्रीति अपने जीवन की अप्रीति कराती है। प्रभू से प्रीति करने के लिए सबसे पहले अपना मन दृढ़ बनाओ भगवान की वाणी समझ में आए या न आए मगर हम प्रश्नचिन्ह तो न लगाएं। राग से ज्यादा अनुराग जरूरी है, प्रीति और स्नेह में बड़ा फर्क है। जो कामना रहित है वह ‘प्रीति है’ और जो बाहर की अभिलाषा से है वह स्नेह है। प्रभू का स्मरण अत्यंत ही लाभदायक होता है। हम पानी में डूबते है तो मृत्यु और भक्ति में डूबते हैं तो मुक्ति है।‘ प्रभू स्मरण से पुण्य बढ़ता है। रत्नाकर पच्चीसी में-
माता-पिता के सामने बोली सुनाकर तोतली, करता नहीं क्या अज्ञ बालक बाल्यावश लीलावती
अपने हृदय के हाल को वैसे यथोचित रीति से, मैं कह रहा हूं आपके आगे विनय से, प्रीति से
27 अगस्त का प्रवचन
मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि शिष्य वह जो समय आने पर अपने शीष का भी समर्पण कर दे। शिष्य जो बनता सही वह गुरु आप ही बन जाता है। …और वही अनन्त उपकारी वीतराग भगवन्त बन सकता है। हमें अच्छा बनने की जितनी ललक है उससे कही गुना अधिक ललक दिखने की है। मुनिवृंद ने कहा किहम काया, वचन, मन की पवित्रता के साथ लक्ष्य पर द्रष्टी रखते हुए शिष्यत्व धारण करेंगे वो निश्चित ही भव से पार हो सकेंगे। पूज्य श्री योगेश मुनि जी ने उत्तराध्ययन सूत्र के 23 वें अध्ययन की पहली गाथा को समझाने में लगभग एक माह पूरा किया जो इस प्रकार है।
‘जिणे पासिति नामेण, अरहा लोग पूईओ, संबुध्प्पा य सव्वण्णू, धम्म तित्थयरे जिणे’।
28 अगस्त का प्रवचन
मुनिवृंद ने धर्मसभा में कहा कि शिष्य जब तक कुछ न कुछ अपने पास रखता है तब तक सब कुछ नहीं पा सकता। इसलिए शिष्य का सर्वस्व समर्पण जरूरी है।
भगवान की तुलना दीपक से करते हुए फरमाया कि दीपक में तो दुर्गुण भी है। धुआं और दीपक तले अंधेरा परन्तु आप में तो कोई भी दुर्गुण ही नहीं है। दीपक एक हवा के झोंके से बुझ जाता है परन्तु ऐसी हवा चले कि पर्वतों को हिला दे तब भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। दूसरी गाथा इस प्रकार है-
तस्स लोग पईवस्स, आसी सीसे महापरो, केसी कुमार-समणे, विज्जा चरण पाइए
हमें कर्म में कुशलता, भाव में पवित्रता और लक्ष्य पर दृष्टि रखनी है। उन्होंने कहा कि वन्दना काया से भी श्रेष्ठ मन की होती है। काया के साथ मन जुड़ जाए तो कहना ही क्या। काया से सीमित पाप होता है, वचन से कई गुना बढ़ जाता है और मन से तो अनन्त गुणा पाप हो जाता है। हमें इन पापों से छुटकारा पाना है। योग्य शिष्य बनकर गुरू चरणों में अपना भाग्य जगाना है।

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