अंतिम सफर की टीस

शहर की सरकार को आम जनता का फिक्रमंद होना चाहिए। लोकतंत्र में यही परम्परा है और उम्मीद भी। लोगों की यह उम्मीद भी जब शेष नहीं रहेगी तो फिर बचेगा क्या? उम्मीद की जानी चाहिए कि नगर पालिका प्रशासन श्मसान व कब्रिस्तान जाने वाली सड़क की सुध लेकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करे।
हर व्यक्ति को सफर का खट्टा-मीठा अनुभव होता है। कई लोग अपने अनुभव को साझा भी करते हैं। लेकिन अंतिम यात्रा पर निकला कोई भी व्यक्ति अपना अनुभव साझा नहीं कर सकता। अलबत्ता, कंधा देने वाले तो अपने अनुभव तो बयां कर ही सकते हैं। श्मसान और कब्रिस्तान को जाने वाली सड़क जर्जर है, लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं। इसे यूं कहें कि अंतिम यात्रा पर निकले व्यक्ति के पार्थिव शरीर को कंधा देने वालों की जान निकल आती है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। बुजुर्गों की सांसें फूल जाती हैं। लोग हलकान हो जाते हैं। कंधा देने वालों का संतुलन बिगड़ जाता है। हालात यह हैं कि मृतक के परिजनों व संबंधियों को अंतिम यात्रा के लिए गली-कूचे के रास्ते तलाशने पड़ते हैं।

हालांकि नगर पालिका प्रशासन ने एक वर्ष पूर्व गुलाबपुरा की ओर जाने वाले जर्जर श्मसान रोड की सुध तो ली लेकिन आधी-अधूरी। अंडरब्रिज के आगे की सड़क रामभरोसे छोड़ दिया गया। यही ‘आधी-अधूरी’ सड़क अब राहगीरों की समस्या बनती जा रही है। स्थानीय जनप्रतिनिधि व समाजसेवी संगठनों के लोग इस समस्या से नगर पालिका प्रशासन को अवगत कराते रहे हैं लेकिन उनकी इस ‘पुकार’ को सुनने वाला कोई नहीं। आखिर नगर पालिका प्रशासन क्यों किसी की पुकार नहीं सुनता। यह अहम सवाल अब पत्थर पर लकीर की तरह होते जा रहा है। शहर की सरकार को आम जनता का फिक्रमंद होना चाहिए। लोकतंत्र में यही परम्परा है और उम्मीद भी। लोगों की यह उम्मीद भी जब शेष नहीं रहेगी तो फिर बचेगा क्या? उम्मीद की जानी चाहिए कि नगर पालिका प्रशासन श्मसान व कब्रिस्तान जाने वाली सड़क की जल्द से जल्द सुध लेकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करे। अंतिम सफर को सुगम बनाने के प्रयत्न किए जाने चाहिए।

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