क्षमा वीरस्य भूषणम्

‘क्षमा’ शब्द बोलकर महज औपचारिकता निभाने के बजाय मन से क्षमा की याचना करना ही इस धर्म का खूबसूरत पहलू है। पूरे मनोभाव से हृदय से प्रस्फुटित क्षमा का सौन्दर्य अनूठा है। इसे शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। सही अर्थों में क्षमा नि:शब्द है।

त्याग, संयम, साधना, तपश्चर्या जैन धर्म के आधार स्तंभ हैं। मन से कषाय को मुक्त रखने पर इस धर्म में विशेष जोर दिया गया है। जैन धर्मावलम्बी पूरे पर्यूषण पर्व में आत्मोत्थान पर चिंतन-मनन करते हुए धर्म मार्ग पर चलने का अनुशरण करते हैं। पर्यूषण की समाप्ति पर एक-दूसरे से क्षमा याचना कर क्षमावाणी पर्व मनाते हैं। जीवन में क्षमा का अपना विशेष महत्व है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं क्षमाशील व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में कषाय के लिए कोई जगह शेष बचती ही नहीं। … और कषाय नहीं हो तो रक्तचाप सहित कई अन्य बीमारियां भी नहीं फटकती।

जैन मुनि धर्मसभाओं में श्रावकों को कषाय से दूर रहने पर बल देते हैं। एक मायने में संयम का परिष्कृत रूप ही क्षमा है। कषाय से मुक्त व्यक्ति ही सही मायने में क्षमा कर सकता है। इसीलिए कहा गया है ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’। क्षमा महज दो अक्षरों का मिलन नहीं है। शब्द से कहीं गहरे इसके मायने हैं। क्षमा मन से हो तभी कषाय की सार्थकता है। धर्म के मूल में यही भाव है।

कषाय रहित मन से क्षमा-याचना से ही मन हल्का हो सकता है। ‘क्षमा’ शब्द बोलकर महज औपचारिकता निभाने के बजाय मन से क्षमा की याचना करना ही इस धर्म का खूबसूरत पहलू है। पूरे मनोभाव से हृदय से प्रस्फुटित क्षमा का सौन्दर्य अनूठा है। इसे शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। सही अर्थों में क्षमा नि:शब्द है। अपने-अपने तरीके से सभी धर्मों में दया का भाव सर्वोपरि है। आने वाले दिनों में अब गणेशोत्सव सहित अन्य त्यौहार हैं। आइए, मिलकर धर्म-ध्वज के तले त्यौहारों का उत्सव मनाएं।
मिच्छामी-दुक्कड़म्

– दिनेश ढाबरिया –

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