आत्म आलोचना और मन की मलिनता दूर करने का पर्व है संवत्सरी

संवत्सरी पर विशेष
आचार्य प्रवर सुदर्शनलालजी म.सा. संवत्सरी का पावन पर्व जिन शासन से जुड़ा हुआ कोई भी दर्शन और कोई भी पर्व, जिसने कोई भी ऐसा निश्चित किया है कि जब व्यक्ति अपनी भीतर की मलिनता को मिटा दे। नवरात्रि के बाद यह दीपावली, आज दीपावली के दूसरे दिन सम्पूर्ण हिन्दू समाज उत्तर भारत में घर-घर जाकर राम-राम इसलिए करते हैं कि अगर दुराव भी हो, अगर वैर-विरोध भी हो तो उस दिन समाप्त हो सके। जब क्रिसमिस डे पर हर व्यक्ति गले मिलता है, हर व्यक्ति एक-दूसरे से क्षमापना कर लेते हैं। आप जानते हैं ना ईसाई धर्म में पादरी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

क्योंकि कोई भी व्यक्ति जब कभी गलती कर लेता है अगर वो पादरी के पास जाकर के बोल दे तो यह माना जाता है कि प्रभू उसकी भूलों को व गलतियों को माफ कर देते हैं। अगर वो भी न हो सके तो चर्च में जाकर के अपनी भूलों व गलतियों को बोल दिया करते हैं। उपनिषद् में ऐसा माना गया है कि जो पवित्र जगह है, जो पवित्र स्थान है, जो पवित्र है उन पवित्र दिवसों में कोई भी व्यक्ति जाकर के अपने गुरु से या प्रभू के मन्दिर में जा कर अपनी भूल या गलतियों को नि:संकोच बोल देता है। उस व्यक्ति की भूल और गलतियां बदल जाती है, खत्म हो जाती है। इस्लाम में रोजा के अन्तिम दिन हर व्यक्ति एक-दूसरे के गले मिलता है।

विश्व के हर धर्म ने भीतर की मलिनता को मिटाने पर जोर दिया है। भीतर के जो पाप हैं उसका प्रायश्चित हो जाय। पाश्चाताप आ जाए इसके लिए कोई घर ऐसा न होगा कि जिसने ऐसा दिन या ऐसी परिस्थिति न देखी हो। प्रकृति जिस दिन बदलती है वह दिन है संवत्सरी का। जिस दिन प्रकृति में सम्पूर्ण लौकिक परिवर्तन आता है वह दिन संवत्सरी है। मैंने एक सकारात्मक स्थिति बताई और एक नकारात्मक स्थिति बताई। जब यह प्रकृति बहुत निचाई पर चली जाती है तब आदमी की अवगाहना बहुत छोटी रह जाती है। ऐसे हालात में ये जमीन पैदा करना बन्द कर देती है। बहुत ज्यादा गर्मी बढ़ती है और बहुत ज्यादा सर्दी बढ़ती है। ऐसे हालात में जो उस जमाने के मनुष्य होते है वे मनुष्य गर्मी के अन्दर गुफा बनाकर रहते हैं। जहां नदी के किनारे होते हैं और वहीं रहते हैं और ज्यादातर मांस या मछली से ही अपना पेट भरते है। पेट भरकर रात को जाल बिछा देते हैं। प्रात: मछलियां पकड़ लेते हैं और सुबह उनका सेवन करे लेते हैं। दिन को उन मछलियों को बिछा देते है और उस गर्मी से मछलियां सूख जाती और शाम को खा लेते हैं।

यह जीवन है उनका क्योंकि प्रकृति ऐसी है, इसलिए ऐसी जिन्दगी जीने के लिए वे मजबूर हैं। मुझे लगता है मजबूरी में जो करे वो तो अलग बात है पर जो जानबूझ कर करे वो? जिन्दगी में जानकर कभी गलत रास्ते पर मत जाना। यह दिन सवंत्सरी का दिन है जिस से आदमी हिंसा से अहिंसा की ओर अग्रसर होता है। इस संवत्सरी के दिन में आदमी संकल्प लेता है कि पाप कर्म को त्यागना है और साधना का जीवन जीना प्रारम्भ करना है। आज इस संवत्सरी के दिन जो अकर्मण्य हो कर इस प्रकृति के वशीभूत हो रहा है और वो मजबूरी में अकर्मणय हो करके कार्य करते है। जो मांसाहारी थे वो आज कर्म करने का संकल्प करते हैं।

आज वे लोग कर्म करके हिंसा से अहिंसक जीवन जीने का प्रयास करते हैं। सोचना जरा कि आज प्रकृति में बदलाव आया है और आज के दिन से हम शाकाहारी जीवन जीयें, ऐसा संकल्प लेते हैं। आज अच्छी शुरुआत का पहला दिवस है। इसलिए मैं संकेत कर रहा था कि ये संवत्सरी महापर्व है। संवत्सरी का अर्थ है- वर्ष या साल। हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार जब चैत्र महिने में नया साल मनाते हैं उसे नव संवत्सर के रूप में जानते हैं। अत: संवत्सर का तात्पर्य है साल और संवत्सरी का तात्पर्य है वर्ष का अन्तिम दिन? ये अन्तिम दिन है व्यक्ति बदलाव महसूस करता है। इस अन्तिम दिन व्यक्ति पाप को छोड़कर पुण्य की ओर बढऩा हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
Skip to toolbar