भगवान शिव ने गणेश को दिया था अग्र पूजनीय वरदान

गणेश चतुर्थी पर विशेष
पं. रामगोपाल शर्मा गुलाबपुरा भारतीय शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जयंती के रूप में मनाया जाता है। किन्तु पुराणों के अनुसार गणेश अवतरण के बारे में विभिन्न मत प्रचलित हैं। शिव पुराण में ‘रूद्र संहिता’ के चतुर्थ खण्ड (कुमार खण्ड) के अनुसार भाद्रपद कृष्णा चतुर्थी को गणेश की अवतरण तिथि बताया गया है। कुमार खण्ड के अनुसार भगवान शिव नर्बदा स्नान के लिए गए। पीछे माता पार्वती ने अपने मैल के उबटन से एक पुतला बनाकर उसमें प्राण संचार कर के द्वार पर बैठा दिया और उसे आदेश दिया कि मैं जब तक अन्दर स्नान करूं तब तक किसी को प्रवेश मत होने देना। इतने में भगवान शंकर स्नान कर लौट आए।

ज्योंहि वे अन्दर प्रवेश होने लगे द्वार पर खड़े बालक ने उन्हें रोक दिया। इस बात से शंकर जी नाराज हो गए और अपने गणों को आदेश दिया कि इस उद्दण्ड बालक को यहां से हटा दो। गणों ने बालक से युद्ध किया। किन्तु आश्चर्य की बात है कि बालक ने सभी गणों को पराजित कर दिया। तब भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक काट डाला और घर में प्रवेश किया। पार्वती ने शिवजी को क्रोधित देखकर समझा कि कोई विशेष घटना हो चुकी है। उन्होंने अपने पुत्र को पुकारा जो द्वार पर पहरा दे रहा था। पुकारने पर भी जब वह नहीं आया तो स्वयं पार्वती द्वार पर पहुंची देखा कि उसका सिर धड़ से अलग पड़ा है।

वह विलाप करने लगीं एवं क्रोधासक्त होकर प्रलय करने की ठान ली। नारदजी की सलाह से समस्त देवता देवी का अनुष्ठान करने लगे। माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना करने लगे। शिवजी के आदेश पर भगवान विष्णु उत्तर के द्वार पर प्रथम प्रवेश हुए हाथी का मस्तक काटकर ले आए। भगवान शिव ने हाथी का मस्तक बालक के धड़ पर लगा दिया। बालक गजानन का रूप लेकर जी उठा। पार्वती उस बालक को गले से लगाकर प्रसन्न हो गई। यह घटना भाद्रपद कृष्णा 4 के चन्द्रोदय के समय की थी। भगवान शिव ने बालक को वरदान दिया कि तुम समस्त देवताओं में अग्र पूजनीय होंगे। समस्त विघ्नों का नाश करने वाले विघ्नेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो जाओगे।

गणेश पुराण के अनुसार गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल 4 चतुर्थी को माना गया है। पुराण के अनुसार भगवान शिव एक बार भोगावती नदी में स्नान करने गए। पीछे से पार्वती ने अपने मैल से पुतला बनाकर द्वार पर बैठा दिया और निर्देश दिया कि अन्दर किसी भी पुरूष को न आने दे। तभी भगवान शिव स्नान कर के लौट आए तो बालक ने उन्हें रोक दिया। भगवान शंकर को क्रोध आ गया। उन्होंने बालक का त्रिशूल से शिरोच्छेद कर दिया। अन्दर प्रवेश कर गए। पार्वती ने शिवजी को क्रोध में देखकर समझा कि शायद भोजन में विलम्ब हो गया, इसलिए इन्हें क्रोध आ गया है। फुर्ती से पार्वती ने दो थालियों में भोजन परोसकर लगा दिया।

आश्चर्य से शिवजी ने पूछा कि यह दूसरी थाली किसके लिए है, तो पार्वती ने उत्तर दिया द्वार पर गणेश मेरा पुत्र बैठा है उसके लिए है। क्या द्वार पर आपको बालक बैठा हुआ नहीं मिला। शिवजी ने उत्तर दिया कि उसने मुझे अन्दर आने से रोक दिया तो मैंने कोई उद्दंड बालक समझ कर उसका मस्तक काट दिया। यह सुनते ही पार्वती विलाप करने लगी। तब शिवजी ने गज मस्तक काटकर बालक के धड़ पर लगा दिया। बालक जीवित हो गया। पार्वती ने बालक को गले से लिपटा लिया। यह घटना भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी को घटित हुई। अत: इस तिथि को गणेश जयंती के रूप में मनाया जाने लगा। गणपति की पूजा करते हैं। लड्डू का भोग अर्पित करते हैं। किन्तु इस दिन चन्द्र दर्शन करना शास्त्रों में वर्जित है। इस दिन चन्द्रदर्शन करने पर झूठा लांछन एवं चोरी का आरोप लगता है। अत: इस दिन चन्द्र दर्शन नहीं करना चाहिए।

स्कंध पुराण के अनुसार एक बार शिवजी एवं माता पार्वती भ्रमण के लिए निकले। नर्बदा नदी के किनारे बैठक कर उन्होंने ‘चौपड़’ खेलने की योजना बनाई। दोनों चौपड़ खेलने बैठे किन्तु शिवजी ने कहा कि यहां हार-जीत का साक्षी कोई नहीं है। इस पर पार्वती ने पास ही लगी दूर्बा से एक पुतला बना कर उसमें प्राण संचार करते हुए कहा कि पुत्र तुम इसका निर्णय करोगे कि चौपड़ खेल में कौन हारा और कौन जीता। खेल समाप्ति के बाद बालक से पूछा कि हममे से कौन जीता बालक ने कहा कि भगवान शिव जी जीते जबकि तीनों बार पार्वती जीती थी। इस पर पार्वती ने गलत निर्णय देने पर बालक को श्राप दे दिया कि तुम एक पांव से लंगड़े होकर इस कीचड़ में पड़े रहोगे।

बालक क्षमा मांगते हुए बोला कि माता आप जीती हैं। अज्ञानतावश मैंने गलत निर्णय दिया। मुझे माफ कर दो माता। तब देवी पार्वती के मन में करुणा भाव पैदा हो गए। उसे कहा कि यहां नाग कन्या गणेश व्रत करने आएंगी। उनसे व्रत की विधि जान कर तुम चतुर्थी व्रत करोगे तब पुन: स्वस्थ हो जाओगे। बालक ने नाग कन्या से विधि पूछ कर चतुर्थी का व्रत किया और पुन: कैलाश पर्वत पर माता पिता शिवजी-पार्वती जी से मिलने गया। जिस दिन कैलाश पर्वत पर जाकर वह देवी पार्वती से मिला उस दिन भी चतुर्थी का दिन था। अत: भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी को गणेश जयंती के रूप में मनाया जाने लगा।

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