क्षमा गंगा की लहर है: डॉ. श्री ज्ञानलताजी म.सा.

बिजयनगर। मनुष्य गलतियों का पुतला है जीवन में जाने-अनजाने अनेक भूलें हो जाती है। मोटी चमड़ी वालों को तो कोई फर्क नही पड़ता लेकिन संवेदनशील प्राणी डरते-डरते परिस्थितिवश कोई भूल कर बैठते है। लेकिन यही भूल ग्रन्थि बनकर जीवन पर्यन्त साथ रहती है। शरीर के जख्म इतने घातक नहीं होते, जितने मन के जख्म घातक होते हैं।
जलके दिल राख हुआ, आंख से रोया ना गया
भूल ने जख्म कुछ ऐसे दिये, फूलों पर भी सोया नही गया…
वर्ष में एक बार क्षमापर्व आता है। यदि हम अन्तर में झांक कर देखें कि हमने किस-किस का दिल दुखाया है, मानसिक पीड़ा दी है, मन को आहत किया है। तो हमें उनसे सविनय सरलता पूर्वक क्षमायाचना कर लेनी चाहिए। क्षमा मांगते ही मन हल्का हो जाता है वैर की गांठ खुल जाती है। परिणाम स्वरूप प्रतिद्वन्द्वी के हृदय में वैमनस्य भी समाप्त हो जाता है। क्षमा सज्जनों का आभूषण है, क्षमा गंगा की लहर है, क्षमा थके हारे व्यक्ति के लिए दरख्त की छांव है। क्षमा अमृत का प्याला है, दुर्गति का ताला है।

क्षमा से मन के दर्पण पर पड़ी धूल साफ हो जाती है। क्षमा से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और गैर भी अपने हो जाते है क्षमा के लिए हाथ उसी के जुड़ते है, शीश उसी का झुकता है जिसके हृदय में भूलों पर पश्चाताप की भावना होती है। कैकयी ने मंथरा के जाल में उलझ कर राम को वनवास देने की भूल तो कर दी लेकिन जब वह पश्चाताप की अग्नि में जली तो मन निर्मल हो गया। संताप दूर हो गया तब श्री राम ने सुव्रत कंठ से प्रशंसा की
पागल सी प्रभू के साथ सभा चिल्लाई
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई
जिस जननी ने जना भरत सा भाई
आज क्षमा पर्व है तो क्यों न हम क्षमा के आभूषण से व्यक्तित्व का श्रृंगार करें। भूले महसूस कर क्षमा मांग ले, दूसरों को क्षमा कर दे और एक ऐसी दुनियां बसायें जिसमें जीवन सरल निश्छल और निष्पाप हो जाए।

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