रोड पर रार-तकरार

(जय एस. चौहान) शिव-भक्ति में गांधारी ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी, लेकिन यहां भ्रष्ट-भक्ति में जिम्मेदारों ने अपनी आंखों पर पट्टी-सी बांध रखी है। शिकायतों को अनसूना कर देना बेहतर प्रशासन का प्रमाण नहीं हो सकता।
कम से कम समय में सड़क उधडऩे की भविष्य में कहीं कोई प्रतियोगिता हो तो निसंदेह बिजयनगर अव्वल होगा। दावा तो नहीं किया जा सकता पर यहां के लोग अब उम्मीद करने लगे हैं कि यहां बनाई गई नई सड़क से हवाई चप्पल कहीं अधिक चलती है। यह न तो अतिरेक है और न ही अतिश्योक्ति, लिहाजा इस पर विचार ही नहीं मंथन भी करना जरूरी है। शिव-भक्ति में गांधारी ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी, लेकिन यहां भ्रष्ट-भक्ति में जिम्मेदारों ने अपनी आंखों पर पट्टी-सी बांध रखी है। शिकायतों को अनसूना कर देना बेहतर प्रशासन का प्रमाण नहीं हो सकता। दूर-दराज और गली की बात होती तो बचाव के लिए दूरी का सहारा लिया जा सकता था, लेकिन यहां मुख्य बाजार में बनी सड़क महज कुछ ही दिनों में बदतर होने लगी है। यह अनदेखी की पराकाष्ठा है। वर्क ऑर्डर से इतर जिस तरह सड़क का निर्माण किया गया, वह घोर अनदेखी की मिसाल है। वर्क ऑर्डर से लेकर सड़क निर्माण में गुणवत्ता तक की जांच होनी चाहिए। जांच के बाद दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी होनी चाहिए। विपक्ष ही नहीं, खुद कांग्रेस के कई पार्षदों ने इस सड़क के निर्माण में हुई गड़बडिय़ों की जांच की मांग की है। आटे मंई नमक तो चल जाता है पर जहां नमक में आटे को निगलवाने की कोशिश होगी तो वहां विरोध के स्वर तो उठेंगे ही। होना भी चाहिए। पानी नाक से ऊपर चला जाए तो खामोश रहना मुर्दे की निशानी है। … और विरोध करना लोकतंत्र की निशानी है। शिकायत को उलाहना कतई नहीं समझना चाहिए। यह कहावत सुनकर कई लोग बड़े हुए होंगे कि ‘काठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है।

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