24 सितंबर से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध पक्ष, जानिए कहां होता है पिंडदान

नई दिल्ली। 24 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं। श्राद्ध का अर्थ है, अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रगट करना। पुराणों के अनुसार, मृत्यु के बाद भी जीव की पवित्र आत्माएं किसी न किसी रूप में श्राद्ध पक्ष में अपनी परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आते हैं। पितरों के परिजन उनका तर्पण कर उन्हें तृप्त करते हैं। ऐसी मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष के 15 दिनों में (प्रतिपदा से लेकर अमावस्या) तक यमराज पितरों को मुक्त कर देते हैं और समस्त पितर अपने-अपने हिस्से का ग्रास लेने के लिए अपने वंशजों के समीप आते हैं, जिससे उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

मान्यताओं के अनुसार, मरने के बाद पिंडदान करना आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति कराता है। पिंडदान करने का सबसे ज्यादा महत्व बिहार के गया का है। इसी जगह पर भगवान राम ने राजा दशरथ का पिंडदान किया था। हालांकि, इसके अलावा देश में कुछ अन्य जगहों पर भी पिंडदान किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान यहां हजारों की संख्या में लोग अपने पितरों का पिण्डदान करते है। मान्यता है कि यदि इस स्थान पर पिण्डदान किया जाय, तो पितरों को स्वर्ग मिलता है। माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद हैं, इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है।

चार प्रमुख धामों में से एक बद्रीनाथ के ब्रहमाकपाल क्षेत्र में तीर्थयात्री अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। कहा जाता है कि पाण्डवों ने भी अपने पितरों का पिंडदान इसी जगह किया था। तीर्थराज प्रयाग में तीन प्रमुख नदियां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। पितृपक्ष में बड़ी संख्या में लोग यहां पर अपने पूर्वजों को श्राद्ध देने आते है।

काशी, यूपी : कहते हैं कि काशी में मरने पर मोक्ष मिलता है। यह जगह भगवान शिव की नगरी माना जाता है। काशी में पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यहां अकाल मृत्यु होने पर पिंडदान करने पर जीव आत्मा को मोक्ष मिलता है।

सिद्धनाथ, एमपी: उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे स्थित सिद्धनाथ में लोग पितरों को श्राद्ध अर्पित करते हैं। कहा जाता है कि यहां माता पार्वती ने वटवृक्ष को अपने हाथों से लगाया था।

पिण्डारक, गुजरात: गुजरात के द्वारिका से 30 किलोमीटर की दूरी पर पिण्डारक में श्राद्ध कर्म करने के बाद नदी मे पिण्ड डालते हैं।लोग यहां अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं।

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