ऐतिहासिक फैसलों के लिए याद किये जाएंगे जस्टिस मिश्रा

नई दिल्ली। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा 2 अक्टूबर को सेवानिवृत हो जाएंगे लेकिन उनके दूरगामी फैसलों को देश कभी नहीं भुला पाएगा। सिनेमाघर की स्क्रीन पर लहराते तिरंगे के साथ होने वाला राष्ट्रगान, महिलाओं से भेदभाव वाले नियम कानूनों को रद करना, और मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन को फांसी का मामला पूरी रात सुनना ऐसे ऐतिहासिक फैसले हैं जो हमेशा उनकी याद दिलाएंगे। जस्टिस दीपक मिश्रा कुल सात साल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे जिसमें 13 महीने मुख्य न्यायाधीश रहे। इस बीच उन्होंने बहुत से फैसले दिये, लेकिन कुछ ऐसे रहे जो ऐतिहासिक हैं। साहित्य व धर्मग्रन्थों का अच्छा ज्ञान रखने वाले जस्टिस मिश्रा के फैसलों में इस ज्ञान को परिलक्षित करने वाले कोट दिखते हैं।

जस्टिस मिश्रा ने महिलाओं के बराबरी के हक को रोकने वाले कानूनों और आधी आबादी को कमतर समझने की घिसी-पिटी सोच पर कुठाराघात करने वाले कई फैसले दिये। उन्होंने हमेशा महिलाओं की बराबरी की हिमायत की फिर चाहें वह फैसला फिल्म इंडस्ट्री मे महिला मेकअप आर्टिस्ट और हेयर ड्रेसर के साथ भेदभाव का हो या केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का, अथवा व्याभिचार के कानून में पत्नी को पति की संपत्ति समझने की मानसिकता, ऑनर किलिंग या पसंद का जीवन साथी चुनने का हक देने वाला हादिया का, सभी का मूल व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बराबरी का हक है।

उन्होंने हमेशा फैसलों के जरिए आतंकवाद और अराजकता को मुंहतोड़ जवाब दिया है। मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फांसी पर पूरी रात सुनवाई के बाद आतंकवाद को बढ़ावा देने वालों को कड़ी सजा पर मुहर लगाई। उनके फैसलों में हमेशा बताया गया कि अराजकता कैसी भी हो, कानून की निगाह में अपराध है। उन्होंने उन्मादी भीड़ की हिंसा रोकने के दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि कानून हाथ में लेने वालों को मालूम होना चाहिए कि उन पर कड़ी कार्रवाई होगी। साथ ही बेलगाम जुबान और अपमानित भाषा पर आपराधिक मुकदमा चलाने के मानहानि कानून को सही ठहराया था। दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म कांड के दोषियों की फांसी को सही ठहराते हुए कहा था कि अगर किसी केस में फांसी दी जा सकती है तो ये वही केस है।

सरकार की महत्वाकांक्षी योजना आधार को अगर कुछ शर्तो के साथ हरी झंडी दी तो उसके नाम पर प्राइवेट कंपनियों की जबरदस्ती पर रोक लगाई। आधार को सिर्फ सब्सिडी से जुड़ी सरकारी योजनाओं तक सीमित किया ताकि निजता और गरिमा के अधिकार मे बेवजह का दखल न हो। व्यक्ति की यौन अभिरुचि को उसकी पसंद और निजता मानते हुए दो वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया। सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले स्क्रीन पर लहराते तिरंगे के साथ जब राष्ट्रगान बजेगा तो सभी को खड़े होकर उसका सम्मान करना होगा। देश प्रेम और राष्ट्रगान के सम्मान के लिए दिये गए इस फैसले को भारत के लोग कभी नहीं भूलेंगे। जस्टिस मिश्रा ने हमेशा अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को सर्वोपरि माना। उन्होंने पद्मावत फिल्म और विभिन्न किताबों व उपन्यासों पर रोक की मांग खारिज की।

जस्टिस मिश्रा को मजबूत मन:स्थिति और अडिग व्यक्तित्व के लिए भी याद किया जाएगा। लंबे कार्यकाल में उन्होंने कुछ बुरा वक्त भी देखा। उन पर व्यक्तिगत हमले हुए लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं खोया। चार जजों ने प्रेस कान्फ्रेंस कर कार्य आवंटन पर आपत्ति उठाई। इससे विचलित होने के बजाए जस्टिस मिश्रा ने जजों के कार्य आवंटन का रोस्टर सार्वजनिक कर दिया। कुछ विपक्षी दलों के सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव दिया जो कि राज्यसभा सभापति ने शुरूआत मे ही खारिज कर दिया था। लेकिन इस दौरान जस्टिस मिश्रा ने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया और यथावत जिम्मेदारियों का निर्वाहन करते रहे।

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