श्रीराम ने किए थे रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए ‘नवरात्रि’ का परायण

देवी दुर्गा के नौ रूपों का वर्णण, ‘प्रथमम् शैल पुत्री च द्वितीय ब्रह्मचारिणी।
तृतीय चन्द्रघटे च कृष्माण्डे ति चतुर्थकम्, पंचमे स्कंध माते च षष्ठे कात्यायनीति च।
सप्तमे काल रात्रि च महागोरा च अष्टमी, नवमे सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता।।
शैली पुत्री: देवी दुर्गा के नौ रूपों में पहला स्वरूप शैल पुत्री है। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने से इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। इनकी पूजा प्रथम दिन में की जाती है। योगी अपने मूलाधार चक्र में स्थित होकर योग साधना आरम्भ करते हैं।
ब्रह्मचारिणी देवी: ब्रह्म का अर्थ है तप और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली। अर्थात् तप का आचरण करने वाली देवी ब्रह्मचारिणी है। इनके दाहिने हस्त में जप की माला और बाएं हाथ में कमण्डल है। इसकी पूजा अर्चना करने से भक्ति का भाव पैदा होता है।
चन्द्रघंटा देवी: तीसरी चन्द्र घंटा देवी हैं। इसके ललाट पर अर्धचन्द्राकार घंटा का चिन्ह अंकित है। इस दिन साधक का मन मणिधर चक्र में अवस्थित होता है।
कृमाण्ड देवी: यह देवी ब्रह्माण्ड की रचयिता मानी जाती है। कृमाण्ड का अर्थ है ‘ब्रह्माण्डू’ इसलिए इस देवी को कृष्माण्ड देवी के नाम से सम्बोधित करते हैं। इस दिन साधक का मन अनाहात चक्र में अवस्थित रहता है।
स्कंध माता: पांचवीं देवी स्कंध माता के नाम से विख्यात हैं। यह कार्तिकेय की माता होने से स्कंध माता के नाम से विख्यात हैं। इनकी पूजा करने से समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है।
कात्यायनी देवी: छठे दिन भगवती कात्यायनी की पूजा की जाती है। इसकी पूजा से भक्त को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की जिससे उनके घर एक कन्या का जन्म हुआ। वह कन्या कात्यायनी देवी के नाम से विख्यात हुईं।
कालरात्रि देवी: सातवीं देवी कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। यह देवी घने अंधकार की तरह हैं। इनके तीन नेत्र हैं। अंगारे की भांति तीनों नेत्रों से आग बरसती रहती है। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। यह देवी काल से भी रक्षा करने वाली मानी जाती हैं। तमग्म आसुरी शक्तियां इनके नाम से ही दूर भागती हैं। इसकी कृपा से भक्त भय रहित हो जाता है।
महागौरी: आठवीं देवी महागौरी देवी हैं। इसकी उपासना से भक्त के समस्त पाप धुल जाते हैं। इनकी उपासना से भक्त को अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी जाती है। नकी चार भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है। अत: इन्हे वृषारूध भी कहा जाता है।
सिद्धिदात्री देवी: यह देवी समस्त सिद्धियों को देने वाली मानी जाती हैं। कहते हैं कि भगवान शंकर ने इस देवी की आराधना करके ही समस्त सिद्धियों को प्राप्त किया था। इस देवी की आराधना से उनका आधा शरीर नारी का हो गया था। अत: उन्हें अद्र्ध नारीश्वर भी कहा जाता है। इनके चारों हाथों में शंख-चक्र-गदा और पद्म धारण रहते हैं। इनका वाहन सिंह है। इस प्रकार नवरात्रि में नौ देवियों की पूजा उपासना करने से कठिन से कठिन कार्य भी आसान हो जाता है।

वैसे तो विश्व में दो ही स्वरूप मुख्य है। प्रथम है ‘शिव’ एवं द्वितीय है ‘शक्ति’। ‘शक्ति’ स्वरूप से ही ‘नवरात्रि’ शब्द का जन्म हुआ है। शास्त्रों में वर्णित है कि सर्व प्रथम भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए ‘नवरात्रि’ का परायण किया। नो रातों तक 108 नील कमल से शक्ति की उपासना की नवदुर्गा का परायण किया। आखिरी रात्रि में रावण ने अपनी मायावी शक्ति से एक नील कमल गायब कर दिया। परायण अधूरा रहने के भय से राम विचलित हो गए। क्योंकि रात्रि में नील कमल की व्यवस्था नहीं हो सकती थी। भगवान श्रीराम ने सोचा कि दुर्गा नाराज हो जाएंगी, 107 नील कमल से परायण अधूरा रह जाएगा। श्रीराम चिंतित हो गए।

उन्होंने सोचा कि लोग मुझे ‘नीलाम्बुज नयन’ कहते हैं। इसका अर्थ है कि ‘नील कमल’ के समान नेत्र वाले श्री राम तो क्यों न अपना एक नेत्र निकाल कर मां दुर्गा को अर्पित कर दूं ताकि पूरे 108 नील कमल हो जाएंगे और मेरा ‘अनुष्ठान’ भी सफल हो जाएगा। उन्होंने तूणिर से तीर निकाल कर अपना एक नेत्र निकालने लगे, तभी मां दुर्गा प्रकट हुई और आशीर्वाद दिया कि राम तुम अपना नेत्र मत निकालो! मैं आशीर्वाद देती हूं कि तुम रावण पर विजय प्राप्त करोगे।

उधर, रावण भी विजयी होने के लिए अनुष्ठान कर रहा था। यह बात जब हनुमान जी को पता चली तो उन्होनें बाल रूप धारण कर चले गए और यज्ञ करते हुए ब्राह्मणों की सेवा करने लगे। ब्राह्मण प्रसन्न होकर बोले कि बालक हम तुम्हारी नि:स्वार्थ सेवा से प्रसन्न हैं, बोलो, तुम  क्या चाहते हो। हनुमान जी बाल रूप में बोले ‘ह’ की जगह ‘क’ कर दीजिए और मुझे कुछ नहीं चाहिए। बा्रह्मणों ने तथास्तु कह दिया। तब बाल रूप हनुमान जी बोले कि आप यज्ञ में जो मंत्र बोल रहे है उसे ‘ह’ की जगह ‘क’ कर दें।

मंत्र था ‘जया देवी भूर्तिहरणी’ इसकी जगह ‘भूर्तिकरणी’ हो गया। इससे इसका अर्थ अनर्थ हो गया। ‘जया देवी भूर्तिहरणी’ का अर्थ था कि प्राणियों के दु:ख को हरने वाली देवी। इसकी जगह ‘क’ करने पर अर्थ हो गया कि ‘प्राणियों को दु:ख देने वाली देवी’ जिससे देवी नाराज हो गई और ‘रावण’ को श्राप दिया कि तुम्हारी पराजय निश्चित है। यह शारदीय नवरात्रि की बात है।

पं. रामगोपाल शर्मा, ज्योतिषाचार्य, गुलाबपुरा

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