असत्य पर सत्य की विजय का पर्व दशहरा

पं. रामगोपाल शर्मा
दशहरा शब्द का अर्थ है दश+होरा अर्थात् दसवीं तिथि दशहरा कहलाती है। आश्विन शुक्ला 10 को दशहरा मनाया जाता है। दशहरे से कई कथाएं जुड़ी हुई हैं, जैसे राम की रावण पर विजय एवं रावण का वध, मां दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध, पाण्डवों का वनवास, मां सती का अग्नि प्रवेश। किन्तु मुख्य रूप से दशहरे का पर्व रामायण काल से ही आरम्भ हुआ है। लक्ष्मण द्वारा सूर्पणखा के कान-नाक काटने का बदला लेने के लिए रावण ने सीता माता का हरण किया। उन्हें मुक्त कराने के लिए राम ने रावण का वध किया। यहीं से दशहरा पर्व आरम्भ हुआ।

राम ने नवरात्रि के नौ दिन तक मां दुर्गा का अनुष्ठान विधि पूर्वक सम्पन्न किया। तब नौवें दिन मां दुर्गा ने राम को रावण की मृत्यु का रहस्य बताया। दसवें दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया, तभी से दशहरे का पर्व आरम्भ हुआ। यह असत्य पर सत्य की विजय थी। इसलिए, दशहरे का पर्व असत्य पर सत्य की विजय के रूप में आज तक मनाया जा रहा है। यह पर्व नवरात्रि के नौ दिन बाद दसवें दिन मनाया जाता है। इस दिन रावण मेघनाथ एवं कुम्भकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं।

ऐसी भी मान्यता है कि पांडवों ने 12 वर्ष के वनवास के दौरान अर्जुन ने अपने शस्त्र ‘शमी’ नामक वृक्ष पर टांग दिए थे और स्वयं वृहंदला के रूप में राजा के यहां गायन, वादन एवं नर्तन सिखाने के लिए नौकरी करने लगे। पुन: 12 वर्ष बाद दशहरे के दिन वापस अपने शस्त्र धारण किए थे। अत: कुछ प्रांतों में ‘शमीवृक्ष’ के पत्ते दशहरे के दिन लाने की भी परम्परा है। उनकी ऐसी मान्यता है कि इस दिन ‘शमीवृक्ष’ के पत्ते लाकर घर पर रखने से धनधान्य की वृद्धि वर्ष भर रहती है।

महिषासुर ने ब्रह्मा जी से अजेय होने का वर प्राप्त किया था। ब्रह्माजी की घोर तपस्या कर के यह वर प्राप्त किया। महिषासुर से समस्त देवता पराजित हो गए। उसने स्वर्ग पर आधिपत्य कर लिया। उसके घोर अत्याचारों से प्रजा दु:खी हो गई, तब सभी देवता मिल कर ब्रह्माजी के पास गए और उसके वध का रहस्य पूछा। ब्रह्माजी ने कहा कि समस्त देवगण अपनी-अपनी दिव्य शक्तियों को इकट्ठा करे और उन दिव्य शक्तियों से सामूहिक रूप से एक ‘दिव्य मां दुर्गा’ का निर्माण करे, मां दुर्गा ही महिषासुर का वध कर सकती है। समस्त देवगण ने ऐसा ही किया।

अपनी-अपनी दिव्य शक्तियों का आह्वान करके सामूहिक रूप से इकट्ठा किया जिससे मां दुर्गा का स्वरूप प्रकट हुआ। नौ दिन तक मां दुर्गा ने महिषासुर से घोर युद्ध किया। अंत में दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया। वह दशहरे का ही दिन था। अत: इस दिन को हम असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाते आ रहे हैं। बहुत से प्रांतों में इस दिन महिषासुर वध किया जाता है।

सती ने बिना निमंत्रण के पिता हिमाचल के यज्ञ में सम्मलित होने की जिद की तो भगवान भोलेनाथ ने उसे मन से स्वीकृति दे दी। सती जब पिता के घर पहुंची तो बहिनों ने ताने मारे, राजा हिमाचल ने तिरस्कार किया और कहा कि बिना आमंत्रण के पिता के घर नहीं आना चाहिए। चारों तरफ तिरस्कार और तानों से दु:खी होकर सती यज्ञ की अग्नि में कूद पड़ी। यह बात भगवान भोलेनाथ को पता चली तो भोलेनाथ अपने गणों सहित यज्ञ में उपस्थित हुए।

सती के अधजले शरीर को अपनी बांहों में उठा कर तीर्थ यात्रा को चल दिए। सती का शरीर जलता गया जगह-जगह उनके अंग गिरते गए। जिन जगहों पर उनके अंग गिरे वह तीर्थ स्थान बनते गए। जिस दिन सती यज्ञ की अग्नि में कूदी थी, वह भी दशहरे का दिन था। अत: उसके स्मृति में भी दशहरा मनाया जाता है। किन्तु मुख्य दशहरे के पर्व का कारण रामायण काल में राम की रावण पर विजय ही रहा। इस दिन रावण का वध हुआ था।

उसकी खुशी में दशहरा पर्व आयोजित किया जाता है। केवल भारत में ही नही अपितु विदेशों में भी दशहरे का पर्व आयोजित किया जाता है। अन्य देश इस पर्व को अपनी संस्कृति के अनुसार मनाते हैं। यह एक शुभ मुहूर्त भी है। इस दिन शुभ कार्य करना मंगलकारी माना गया हैं। दशहरे के बीस दिन बाद रावण को मार कर राम आयोध्या लौटे थे। अत: उनकी लौटने की खुशी में दीपावली का पर्व मनाया जाता है।
नवरात्रि में कन्या पूजन
नवरात्रि में कन्या का पूजन किया जाता है। उन्हें भोजन कराया जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि नवरात्रि में कन्या का पूजन करने से देवी शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं तथा कन्या को भोजन कराने से घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है। इसलिए जगह-जगह हजारों की संख्या में कन्या भोज आयोजित किए जाते हैं। कन्या को स्वयं देवी का रूप मानकर उसका पूजन नवरात्रि में किया जाता है। शैलपुत्री के रूप में इसकी प्रथम पूजा होती है। इसलिए, कन्या पूजा का विधान नवरात्रि में हैं।
शस्त्र पूजन एवं अश्व पूजन
अश्विन मास के दशहरे के दिन क्षत्रिय एवं अन्य शस्त्रधारी शस्त्र का पूजन भी करते हैं। कहीं-कहीं इस दिन अश्व पूजन भी किया जाता है। यह दशहरा युवाओं में देश प्रेम भरने वाला त्यौहार भी है। इसलिए शस्त्र पूजन का विधान है। जिससे शक्ति एवं जोश का संचार होता है। अत: इस पर्व को शक्ति का पर्व भी माना जाता है।

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