कायम है गंगा-जमुनी तहजीब की मिठास

28 को निकलेगा ताजिये का जलसा
बिजयनगर। कस्बे में मोहर्रम चालीसवां की पिछले ‘पांच दशक से सौहार्द गौरवशाली परम्परा’ चली आ रही है। देश भर में इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मोहर्रम के चांद की 10 तारीख को पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हसन और हुसैन की कर्बला में शहादत की याद में ताजिया निकाले जाते हैं। वहीं कस्बे में इस दिन से 38 दिन बाद 40वां का ताजिया निकालने अनूठी परंपरा रही। इस वर्ष भी 28 अक्टूबर को दिन में शानदार ताजिया का जलसा शहर में परंपरागत मार्गों से निकाला जाएगा।

आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व स्थानीय समुदाय ने अपनी आस्था से ताजिया निकालने की आवश्यकता महसूस की, तब प्रशासन ने मोहर्रम की 10 तारीख को कानून व्यवस्था की असमर्थता प्रकट करने पर तत्कालीन सरपंच सुगनचंद सिसोदिया एवं सोहनलाल तातेड़ (दरबार) सहित प्रमुख नागरिकों के प्रयासों से जन भावना का उत्सव आयोजन की शुरुआत हुई, जो आज भी शहर की सांप्रदायिक सौहार्द की गौरवशाली परंपरा की कडिय़ों में एक है। तब से अब तक का शहर में विकास के साथ तीन बार जुलूस के रास्ते बदले लेकिन गंगा-जमुनी तहजीब की मिठास आज भी कायम है।

पहला मोहर्रम का मुकाम बालाजी मंदिर के पास तत्कालीन पुजारी की के आग्रह पर लगाया गया। जिसमें शहर के सभी लोगों ने अखाड़ा प्रदर्शन किया। प्रथम ताजिये के सहयोगी रहे फारुख रंगरेज के अनुसार पहली बार ताजिया में स्व. गुलाब बाई रंगरेज ने महिलाओं से सहयोग राशि प्राप्त कर इंतजामियां कमेटी के सदर बाबू भाई रंगरेज को जमा कराई। जिससे ताजिया इमारत का निर्माण हुआ। वर्तमान मोहर्रम इंतजामियां कमेटी के सदर एवं लाइसेंसधारी अब्दुल शकूर मेवाती ने बताया कि 40वां की चाँद की 18 तारीख को ही आयोजन के पीछे कारणों में एक यह उस समय यहां की दो प्रमुख बड़ी बिरादरी की रिश्तेदारी जावरा (मध्य प्रदेश) से जुड़ी थी।

जहां शहादत के 40 दिन बाद हुसैन टेकरी में जलसा की प्राचीन परम्परा रही है। उसके ही ठीक 2 दिन पहले की तिथि यहां तय की गई ताकि आस्थावान दोनों जगह अपनी उपस्थिति दे सकें। खारीतट पर बसे दोनों कस्बों में होने वाले विभिन्न उत्सवों एवं आयोजन में मोहर्रम 40वां भी कार्यक्रम है जिसमें स्थानीय समुदाय आस्था भाव से जुड़ा है। इसका प्रमाण रेलवे स्टेशन पर आखिरी मुकाम पर सभी जाति वर्ग विचारधारा के लोग ही मंच पर एकता, अखंडता और प्रेम का पैगाम देते हैं। इस कार्यक्रम में प्रारंभ से ही आज तक नसीराबाद से दिल्ली वाले उस्ताद का अखाड़ा प्रदर्शन करता रहा है। इसी तरह इमारत का निर्माण पिछले 12 वर्ष से मुस्तकीम बाबा ‘नीमच वाले’ अपने हाथों से करते आ रहे हैं।
साभार: मास्टर अख्तयार अली

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