आलोक वर्मा ने याचिका में की सीबीआई की स्वतंत्रता की मांग

नई दिल्ली। सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में कहा है कि सीबीआई को एक स्वतंत्र और स्वायत्त एजेंसी बनाए जाने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने अपनी याचिका में केंद्रीय सर्तकता आयोग और डीओपीटी के आदेश को मनमाना और गैरकानूनी बताते हुए रद्द करने की मांग की है। याचिका की कापी के मुताबिक सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना पर निशाना साधते हुए कई आरोप लगाए हैं। उन्होंने अपनी याचिका में लिखा है कि उन्हें जनवरी 2017 में देश की सबसे महत्वपूर्ण जांच एजेंसी का निदेशक बनाया गया था और भारतीय पुलिस सेवा में उनका 35 सालों का रिकॉर्ड निर्विवाद और साफ-सुथरा रहा है।

उन्होंने लिखा है कि सीबीआई के स्वतंत्र और स्वायत्त एजेंसी होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन हाल के संवेदनशील मामलों में जांच अधिकारी से लेकर संयुक्त निदेशक और निदेशक तक की सहमति थी, लेकिन उनके डिप्टी राकेश अस्थाना ने बिल्कुल अलग रुख अपनाया। वर्तमान हालातों में ऐसा कदम उस वक्त उठाया गया जब उच्चाधिकारी के खिलाफ जांच उस दिशा में नहीं गई, जैसी सरकार से उम्मीद थी। उनका कहना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में अस्थाना के दिकक्तें पैदा करने से याचिकाकर्ता की छवि को नुकसान पहुंचा है। इस मामले में सीबीआई ने अलग से एफआईआर रजिस्टर की, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट में चैलेंज किया गया। वर्मा की याचिका के मुताबिक मामलों की जांच चल रही थी कि रातोंरात केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और केंद्र सरकार ने उनकी सारी शक्तियां छीन लीं और किसी दूसरे की नियुक्ति कर दी। सरकार का यह फैसला डीपीएसई अधिनियम की धारा 4बी के खिलाफ है, जो सीबीआई को स्वतंत्रता बनाने और सीबीआई निदेशक बने रहने के लिए दो साल का सुरक्षित समय प्रदान करता है।

वर्मा ने अपनी याचिका में केंद्र सरकार और केंद्रीय सर्तकता आयोग को पार्टी बनाते हुए सीवीसी, डीओपीटी के 23 अक्टूबर के आदेशों को संविधान की धारा 14, 19 और 21 का उल्लंघन बताते हुए निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने अपनी याचिका में यह भी लिखा है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि सीबीआई को सरकार से अलग किया जाना चाहिए और हाल ही में इन घटनाक्रमों से यह साफ हो जाता है कि सीबीआई को डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ट्रेनिंग (डीओपीटी) से स्वतंत्र किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे संस्थान की आजादी पर गंभीर खतरा हो रहा है। साथ ही उन्होंने याचिका में लिखा है कि किसी भी सूरत में धारा 4ए प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और चीफ जस्टिस को उच्चस्तरीय समिति बनाने की अनुमति देता है, जो सीबीआई निदेशक की नियुक्ति कर सकती है। साथ ही धारा 4बी(2) के तहत सीबीआई निदेशक को स्थानांतरित करने के लिए इस समिति की सहमति आवश्यक है। लेकिन इस मामले में कानून से बाहर फैसला ले कर समिति के जनादेश को दरकिनार कर दिया गया।

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