जनवरी में होगी अयोध्या मामले की सुनवाई

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की विवादित भूमि से संबंधित मामले की सुनवाई जनवरी तक स्थगित कर दी है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सोमवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर 2010 के फैसले को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि जनवरी, 2019 में यह मामला उचित पीठ के समक्ष पेश किया जाएगा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया गया था।

मामले की जल्द सुनवाई की दलीलों के बीच न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा,“ हमारी अन्य प्राथमिकताएं भी हैं।” पीठ के अन्य सदस्य न्यायमूर्ति किशन कौल और न्यायमूति के एम जोसफ हैं। मामले की अगली सुनवाई की तारीख अथवा नयी पीठ के गठन के संबंध में कोई फैसला आज नहीं किया गया। शीर्ष न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई की अगली तारीख भी जनवरी में तय की जाएगी।

गौरतलब है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा था कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला में बराबर-बराबर बांट दिया जाए। उच्चतम न्यायालय में पिछले आठ वर्ष से यह मामला चल रहा है। उच्चतम न्यायालय ने 27 सितंबर को इस्माइल फारुकी मामले में अपने 1994 के फैसले पर पुनर्विचार करने से इन्कार कर दिया था जिसमें कहा गया था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और मुसलमान कहीं भी नमाज पढ़ सकते हैं, यहां तक कि खुले में भी।

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय खंडपीठ ने 2:1 के बहुमत का फैसला सुनाते हुए कहा था कि इस्माइल फारूकी मामले में इस न्यायालय का 1994 का फैसला भूमि अधिग्रहण से जुड़ा और विशेष संदर्भ में था। अयोध्या भूमि विवाद की सुनवाई में उस बिंदु को शामिल नहीं किया जा सकता। खंडपीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर थे।

न्यायमूर्ति नज़ीर ने अपने दो साथी न्यायाधीशों के विचार से असहमति जताते हुए कहा कि इस बिंदु की वृहद पीठ से समीक्षा कराना अनिवार्य है। पीठ ने कहा था कि अयोध्या भूमि विवाद से जुड़े मुख्य मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय पीठ 29 अक्टूबर को करेगी। उल्लेखनीय है कि 16वीं शताब्दी में निर्मित बाबरी मस्जिद को छह दिसम्बर,1992 को लाखों कारसेवकों ने ध्वस्त कर दिया था। उन्होंने इसे भगवान राम का जन्म स्थान बताते हुए वहां राम मंदिर निर्माण की मांग की थी। उसके बाद से यह मामला हमेशा चर्चा में रहा है और 2014 के आम चुनाव में यह भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र में एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी था।

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