समुद्र मंथन में प्रकट हुए थे भगवान धनवन्तरी

धनतेरस : दीपावली भारतवर्ष का मुख्य त्यौहार माना जाता है। इसका आरम्भ कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी से ही आरम्भ हो जाता है एवं कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा तक चलता हैं। दीपावली पर्व के प्रारम्भिक दिन को धनतेरस के नाम से पुकारते है। वैसे इस पर्व के कई नाम है।
पं. रामगोपाल शर्मा गुलाबपुरा। धन तेरस ‘कुबेर’ का दिन है कुबेर धन के खजाने का स्वामी है। इसलिए इसे धनतेरस कहा जाता है। बहुत से लोग इस दिन ‘कुबेर पूजा’ करते हैं। प्राचीन काल में रजत एवं स्वर्ण मुद्राओं का चलन था। उन दिनों लोगों को अपना धन सुरक्षित रखने के लिए पीतल या ताम्बे के बर्तन घड़े, मटके आदि का प्रयोग करना पड़ता था। इनमें मुद्रायें रखकर जमीन में गाड़ देते थे। आवश्यकता पडऩे पर जमीन खोदकर इन बर्तनों में से धन निकाल लेते और पुन: जमीन में ही रख देते। यही उन लोगों का खजाना हुआ करता था। इसे ही वे अपना बैंक समझते थे।

धनतेरस कुबेर का दिन मानते हैं। इसलिए इस दिन कुबेर का खजाना अर्थात बर्तन खरीदने की परम्परा थी जो आज भी चली आ रही है। बर्तनों के व्यापारी इस दिन अपनी दुकान में ढेर सारे बर्तन सजाकर रख देते हैं। लोग इस दिन बर्तन अवश्य खरीदते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन धातु खरीदना शुभ माना जाता है। अत: लोग इस दिन धातु के बर्तन विशेषकर मटके घड़े आदि अवश्य खरीदते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन बर्तन खरीदने से कुबेर देवता प्रसन्न होते है और वर्षभर धन धान्य की कमी नहीं रहती है। कुछ लोग इस दिन चांदी खरीदना भी शुभ मानते हैं। स्वर्ण भी खरीदा जाता है। अर्थात धातु की चीजें इस दिन लोग अवश्य खरीदते हैं।
धनवन्तरी त्रयोदशी
जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तब कार्तिक कृष्णा पक्ष की त्रयोदशी को समुद्र मंथन में भगवान धनवन्तरी प्रकट हुए। ये देवताओं के वैद्य थे। अत: इस दिन उनके प्रकट होने से हम इस दिन को धन्वन्तरी त्रयोदशी के नाम से पुकारते हैं। इस दिन आयुर्वेदाचार्य भगवान धन्वन्तरी की पूजा अर्चना करते हैं। किसी नवीन औषधि के निर्माण के लिए इस दिन का चयन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान धन्वन्तरी की पूजा करने से वर्षभर काया निरोगी बनी रहती है और दीर्घायु प्राप्त होती है।

धनतेरस प्रत्येक धर्मावलम्बी के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व हैं। यह पर्व धन सम्पदा को देने वाला पर्व हैं। साथ ही आरोग्यता और दीर्घायु प्रदान करने वाला पर्व हैं। आध्यात्मिक प्रवृत्ति प्रदान करने वाला पर्व हैं। धनतेरस भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी मनाई जाती हैं। प्रत्येक प्रांत में अपनी संस्कृति के अनुसार इस पर्व को लोग मनाते है। गुजरात प्रांत में एवं महाराष्ट्र में कुछ व्यक्ति तो इस दिन लक्ष्मी की पूजा भी करते हैं। उनकी मान्यता है कि कुबेर देवता ही लक्ष्मी को देने वाला है। अत: इस दिन लक्ष्मी का पूजन करने से कुबेर देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं। राजस्थान में इस दिन बर्तन खरीदने की परम्परा है। अमीर से लेकर गरीब तक इस दिन कोई न कोई धातु की चीज अथवा बर्तन जरूर खरीदते हैं।
यमदीपदान से नहीं होती अकाल मृत्यु
यमदीप का विधान
धनतेरस के दिन सूर्यास्त के समय आटे में हल्दी डालकर उसका दीपक बनावें। उसमें तेल डालकर दो बड़ी बाटों को रखकर उनके चारों सिरे चार दिशाओं मे करें। उस दीपक को प्रवेश द्वार पर स्वस्तिक मांड कर अनाज के दाने पर रखकर जलाएं, यह यमदीपक है। जिस घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर यह दीपक रखा जाता है उस घर में रहने वाले परिवार के व्यक्तियों की अकाल मृत्यु नहीं होती है और वे दीर्घजीवी होते हैं। ऐसा यमराज का वचन है। अत: सभी को इस दिन अपने घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर यम दीप दान करना चाहिए।

धनतेरस के दिन यमदीपदान भी किया जाता है। एक पौराणिक कथा के आधार पर यह बताया गया है कि एक समय की बात है कि एक राजा शिकार पर गया। उसी दिन उसके महलों में रानी ने एक राजकुमार को जन्म दिया था। ग्रह नक्षत्र के आधार पर पंडितों ने बताया कि यह बालक अपने विवाह के चौथे दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। एक दिन यमराज ने अपने यमदूतों को कहा कि तुम्हें कभी ऐसा अवसर भी आया कि जब प्राण हरते समय तुम्हें दया का भाव मन में पैदा हुआ हो। यमदूतों ने कहा कि महाराज हमें तो आदेश का पालन करना है। इसमें दया भाव पैदा होने का प्रश्न ही नही हैं।

तब यमराज बोले कि तुम संकोच मत करो और सच सच बताओ कि लोगों का प्राण हरते समय कभी दया का भाव पैदा हुआ क्या? इस पर यमदूत बोले कि महाराज एक अवसर ऐसा आया था जब हमारे मन में दया का भाव उत्पन्न हुआ था। एक राजकुमार का विवाह होने के चार दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके प्राण हरते समय हमें दया का भाव पैदा हो गया था। यह वही राजकुमार था जिसको रानी ने जन्म दिया था। पुन: यमदूत बोले कि महाराज ऐसी अकाल मृत्यु से बचने का भी क्या कोई उपाय है? तब यमराज बोले ऐसी अकाल मृत्यु से रक्षा हो सकती है। यदि धनतेरस के दिन अपने घर के मुख्य द्वार पर यमदीप दान किया जाय तो अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है। और उस मकान में निवास करने वाले लोग भी दीर्घायु प्राप्त करते हैं।
यमदीप एवं चिरी पूजन का मुहुर्त कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी सोमवार संवत् 2075 सांय 5:50 से 08:14 तक है।
ध्यान त्रयोदशी
ध्यान योग में लीन हो गए थे भगवान महावीर स्वामी
जैन शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि श्री महावीर स्वामी अपने निर्वाण (मोक्ष प्राप्ति) के पूर्व ध्यान योग में चले गए थे। भगवान महावीर स्वामी जिस दिन ध्यान योग में गए उस दिन कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी थी। अत: इसे हम ध्यान त्रयोदशी के नाम से पुकारते हैं। तीन दिन तक ध्यान में रहने के बाद दीपावली के दिन भगवान महावीर स्वामी का ‘निर्वाण दिवस’ आ जाता है। अर्थात दीपावली के दिन उनको मोक्ष प्राप्त हो जाता है। अत: जैन शास्त्रों के अनुसार यह दिन ध्यान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस लिए हम इसे ‘ध्यान त्रयोदशी’ के नाम से भी पुकारते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
Skip to toolbar