गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट

पं. रामगोपाल शर्मा। एक बार कृष्ण ने अपनी मैय्या से पूछा कि मैय्या आज सब अपने घर में मिठाईयां क्यों बना रहे हैं। पूजा करने की तैयारी क्यों कर रहे हैं। मैय्या बोली लल्ला! आज हम सब देवराज इन्द्र की पूजा करेंगे इसलिए इसकी तैयारी कर रहे हैं। कृष्ण ने कहा कि देवराज इन्द्र की पूजा क्यों करेंगे। माता ने कहा कि वे वर्षा के देवता हैं, जिससे अन्न की पैदावार होती है। कृष्ण बोले कि नहीं मां वर्षा तो गोवर्धन पर्वत से होती है। हमारी गायें पर्वत पर चरती हैं, इसलिए इन्द्र की नहीं, हम आज गोवर्धन पर्वत की पूजा करेंगे। गोवंश की पूजा करेंगे, उसी से हमें दूध, दही, मक्खन अनाज सब खाने को मिलता है।

अत: आज गोवर्धन की पूजा होगी। सभी ग्रामवासियों ने गोवद्र्धन की पूजा करने की तैयारी कर ली। इस पर इन्द्र नाराज हो गए और उन्होंने सात दिन तक घनघोर मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। सभी ग्रामवासी बहुत दुखी हो गए और कृष्ण को कोसने लगे कि इसके कहने से गोवर्धन की पूजा की है, जिससे हमें घनघोर मूसलाधार वाली वर्षा का सामना करना पड़ रहा है। कृष्ण ने गोवद्र्धन पर्वत को अपनी चिटी (कनिष्क) उंगली पर उठा लिया। सुदर्शन चक्र को आदेश दिया कि तुम पर्वत पर ढ़ाल बन कर वर्षा के वेग को रोको। शेषनाग को कहा कि तुम पाल बनकर वर्षा का पानी रोको। तब सात दिन बाद ब्राह्मणों ने इन्द्र को कहा कि श्रीकृष्ण विष्णु के अंशावतार हैं। अत: तुम इनसे माफी मांगो। तब इद्र स्वयं कृष्ण के पास आए और क्षमा याचना की और वर्षा रोकी।

सबने मिलकर गोवंश और बैलों को इकट्ठा किया और उनकी पूजा की एवं सभी प्रकार के अन्न को मिलाकर भोग लगाया। बैलों को रंगकर उन्हें गुड़ एवं चावल खिलाए। जिस दिन इन्द्र स्वयं श्री कृष्ण से क्षमा याचना करने आए थे, वह कार्तिक शुक्ल एकम का दिन था। अत: इस दिन को हम गोवर्धन पूजा एवं गौवंश पूजा के रूप में मनाते आ रहे हैं। इस दिन अन्नकूट के रूप में सभी प्रकार का अन्न इकट्ठा करके पकाया जाता है। इसलिए इसको अन्नकूट का नाम दिया गया है। इस अन्नकूट का भगवान के भोग लगा कर सभी प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण करते हैं। इस दिन भी व्यक्ति अपने घरो में दीपक जलाते हैं।

दीपावली का पर्व हमें उपनिषद के इस वाक्य की याद दिलाता है। ‘असतो मा सद्गमय’ तमसो मा ज्योतिगर्मय’ अर्थात् दीपावली पर्व असत्य पर सत्य की जीत का पर्व हैं। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का पर्व है। इस दिन मिट्टी के दीये जलाने की परम्परा चली आ रही है। मिट्टी को पवित्र माना गया है तथा मिट्टी के दीपक का प्रकाश आंखों की ज्योति को बढ़ाने वाला माना गया है। यह सुख और समृद्धि देने वाला प्रकाश है। इसलिए प्रत्येक पूजा के अवसर पर दीपक जलाने की परम्परा है। समाज में दीपावली के दिन फटाखे को जलाने या फटाखे चलाने की परम्परा अपने आप चली है। शास्त्रों में फटाखे चलाने का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। इनसे वातावरण प्रदूषित होता है। दीपावली हर्ष, उल्लास, प्रेम व स्नेह का पर्व है।

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