भिनाय की कोवडा मार होली है ऐतिहासिक, लोगों को बेसब्री से रहता है इंतजार

  • Devendra
  • 20/03/2019
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(फाईल फोटो)
भिनाय। (राजेश मेहरा) भिनाय कस्बे में सैंकड़ो वर्षो से खेली जा रही कोवड़ा मार होली ऐतिहासिक व विश्व प्रसिद्ध होलियों में से एक है। हजारो नर-नारियों की मौजूदगी के दौरान ए-आहा, ए-आहा के शोर के बीच चौक व कावडियो के जांबाज मर्द हाथों में कौडा लिए जंग के लिए जूझते है और जान हथेली पर लेकर अपने-अपने पक्ष की जीत के लिए जान जोखिम में डाल देते है। यह हाल विश्व प्रसिद्ध भिनाय की कोडा राड होली का है, जो होली के दिन से होली के नावण तक खेली जाती है। लगभग चार सौ वर्षों पूर्व से चली आ रही इस कोवडा राड की आन- बान-शान को सांस्क्रतिक विरासत के रूप में संभाले आ रहे है भिनाय के नागरिक। इस कोवडा मार होली का इतिहास भिनाय के राज परिवार से जुडा हुआ है।

कस्बे के बुजुर्गो ने बताया कि आज से लगभग 450 वर्ष पूर्व जोधपुर महाराजा राईमल के पुत्र चन्द्रसेन को मुगल शासको ने निष्कासित कर दिया था। निष्कासन के दौरान वह इधर-उधर भटकता रहा। इसी बीच चन्द्रसेन के युवा पुत्र करम सैन की नजर अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की पूर्व राजधानी रेण पर पडी और 425 वर्ष पूर्व उसने रेण के नजदीक भिनाय की स्थापना की। भिनाय की स्थापना के बाद इस राज्य की हिफाजत के लिए वीर सैनिको की आवश्यकता महसूस की गई तब राज परिवार ने जनसाधारण में से वीर सैनिको की छटनी के लिए नायाब तरकीब निकाली और कोवडा राड होली की शुरूआत की।

इस कोडा राड के लिए दो दल बनाए गए, जिनमे राजा समर्थक चौक व रानी समर्थकों को कावडिया नाम दिया गया। भिनाय के बीचों-बीच बने राजमहल से मुख्य मार्ग निकलता है जो कस्बे को दो भागो में विभक्त करते हुए कस्बे के बाहर जा रहा है। जिसे बडा बाजार के नाम से जाना जाता है, बडा बाजार के दाएं हिस्से को चौक व बाएं हिस्से को कावडिया नाम दिया हुआ है। राजघराने के लिए खेला जाने वाला यह खेल कुछ समय के लिए महाजन वर्ग से जुड गया था लेकिन वर्तमान में सभी वर्गों के लोग इसमें हिस्सा लेने लगे है। फाल्गुन माह के लगते ही कस्बे के परकोटे पर स्थित दरवाजों रैण दरवाजा, भैरू दरवाजा, चावण्ड दरवाजा, महल और पहाड की चोटी पर स्थित किले में होली गाड दी जाती है। कस्बे के बीचों-बीच जिसे मापा कहा जाता है। पर कस्बे के नौजवान फाल्गुन गीत व होली के विशेष गीत जिन्हे केश्या कहते है गाते है।

पूर्व में फाल्गुन माह का माहौल एक माह तक रहता था लेकिन वर्तमान मे 4-5 दिन तक ही सिमट कर रह गया है। होली के दूसरे दिन धूलण्डी वाले रोज सवेरे से ही क्षैत्र में कोवडा राड का खूमार छा जाता है। होली के एक पखवाडे पूव से ही कोडे बनाए जाने लगते है। कोडे बनाने के लिए गुल बांस व सूत की मोटी रस्सी का प्रयोग किया जाता है। धूलण्डी के रोज रंग खेलने के बाद भिनाय व आसपास के गावों के लोग कोवडा राड देखने के लिए कोवडा बाजार में आ जाते है। पूरा बाजार व बाजार में बनी दुकानों व मकानों पर हजारों की तादाद में जन सैलाब उमड पडता है।

जैसे जैसे कोडाराड का समय नजदीक आता है जनता का उत्साह बढता जाता है। कोवडा राड खेलने वाले जाबाज खिलाडी भी पूरी तैयारी के साथ मैदान मे उतरते है। अपने सिर व शरीर को मार से बचाने के लिए सिर पर साफे बांधते है जिसे डाटा कहा जाता है। शरीर को बचाने के लिए एक से अधिक कपड़े पहनते है। मापे पर खेले जाने वाले इस खेल मे पहले चौक के खिलाडी पूरी तैयारी से खडे हो जाते है। फिर अचानक कावडिया दल के खिलाडी भाग कर आते है और फिर मचता है घमासान। दोनों दलों के खिलाडी पूरे जोर से एक दूसरे पर कोडे का प्रहार करते है और प्रतिद्वंद्वी को मैदान छोडकर भागने पर मजबूर करते है। जो भी दल पहले मैदान छोडकर भाग जाता है उसे हारा हुआ माना जाता है।

पूर्व में राजाओ के समय यह खेल 6-6 घन्टो तक दिन और रात मेें चलता था। बाद में यह खेल 15-20 मिनट व वर्तमान में 5-7 मिनट ही चलता है। आजादी के पूर्व इस खेल में कई खिलाडी शहीद भी हो चुके हैं। जिनकी देवलिया आज भी बनी हुई है। कोडै खेले जाने से पूर्व इन देवलियों की पूजा की जाती है। दोनों ही दलों की रक्षार्थ दोनों तरफ भैरूजी की मूर्तियां रखी जाती है व ढोल और नगाडा बजाया जाता है। ढोल व नगाडे की थाप सुनकर वहां एकत्र जन समुदाय की रघों में जोश भर जाता है। खेल समाप्त होने के बाद भांग व गुड़ वितरित किया जाता है। इस खेल में भाग लेने वालों को लोग आज भी सम्मान की दृष्टि से देखते है।

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