परिवार की दशा सुधारने के लिए की जाती है दशा माता की पूजा

  • Devendra
  • 28/03/2019
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गुलाबपुरा। प्रतिवर्ष चैत्र कृष्णा दशमी को महिलाएं अपने सुहाग को सुरक्षित रखने के लिए एवं अपने घर परिवार की दशा सुधारने के लिए ‘दशा माता’ का व्रत रखती हैं। पीपल की पूजा शुभमुहुर्त में करके एक दस सूत का धागा गले में पहनती हैं। जिसके दस गांठें लगाती है। इसे ही दशा माता का व्रत कहते है और इस दिन महिलाएं कहानी सुनती है।

एक पौराणिक एवं प्रमाणिक कथा के अनुसार दशा माता का महत्व बताया गया है। प्राचीन समय में राजा नल एवं रानी दमयन्ती राज करते थे। उनके राज में पूर्ण सम्पन्नता थी। हाथी, घोड़े, लाव लश्कर, हीरे-पन्ने, स्वर्ण रत्नों के भंडार आदि भरे थे। दोनों राजा रानी पूर्ण संतुष्ट एवं सुखी थे। एक समय की बात है कि चैत्र कृष्णा दशमी को ‘दशा माता’ वृद्धा का रूप धारण करके राज महल में पहुंची। उसने रानी से कहा कि बेटी यह सूत का धागा आज अपने गले में बांध लेना, व्रत रखकर पूजा करना। रानी ने वृद्धा के कहे अनुसार व्रत करके पूजा करके धागा गले में बांध लिया, जिसे आजकल बेल कहते है। समय बीतता गया। सम्पन्नता बढ़ती गई। एक दिन उस धागे पर राजा नल की नजर पड़ी। उसने कहा कि तुम्हारे गले में स्वर्ण रत्न जडि़त हार पड़े हैं इस धागे को गले में क्यों बांध रखा है। ऐसा कहकर राजा ने धागे को तोड़ कर जमीन पर फेंक दिया। रानी ने कहा कि यह तो दशा माता की बेल है और आपने इसे तोड़ कर फेंक दिया।

उसी दिन से राजा की सम्पति नष्ट होने लगी। कुछ दिन में तो सब समाप्त हो गया। भूखे मरने की नौबत आ गई। राजा ने रानी से कहा कि अब किसी अन्य स्थान पर चल कर मजदूरी करके पेट भरते हैं। ऐसा कहकर राजा-रानी और उसके दो पुत्र अन्य स्थान पर चल पड़े। चलते-चलते एक गांव में राजा का एक मित्र रहता था। राजा ने रानी से कहा कि आज रात्रि विश्राम मित्र के घर पर ही करते हैं। मित्र को सूचना दी। वह आया और राजा रानी को घर ले गया। अच्छा खाना खिलाया। राजा को पलंग पर सोने की व्यवस्था कर दी। जिस कमरे में राजा-रानी सो रहे थे वहां एक ‘मोर’ के आकार की खूंटी पर मित्र की पत्नी का नौलखा हार टंगा हुआ था। राजा अर्द्धरात्रि को जागा तो क्या देखता है कि वह मोर के आकार की खूंटी उस हार को निगल रही है। राजा ने रानी को उठाया कहा कि मित्र सोचेगा कि मैंने हार चुरा लिया है। अत: दोनों अर्द्धरात्रि को ही घर छोड़ कर रवाना हो गए।

चलते-चलते रास्ते में ‘भील राजा’ का राज्य आ गया। उन्होंने अपने दोनों बच्चों को भील राजा को सम्भला कर राजा रानी आगे बढ़ गए। दिनभर चलने के बाद राजा की बहिन का गांव आया। राजा ने सोचा कि आज रात्रि विश्राम बहिन के घर करेंगे। बहिन को रानी के साथ बिना लाव लश्कर के आने की सूचना भेजी। यह सुन कर बहिन दो रोटी पर दो प्याज (कांदे) रखकर ले आई। राजा और रानी ने एक-एक रोटी पर एक-एक प्याज रखकर जमीन में गाड़ दी और आगे बढ़ गए। चलते-चलते रानी का मायका रास्ते में पड़ गया। राजा ने कहा कि तुम अपने मायके के राजमहल में दासी बनकर रहो। मैं इसी गांव में कोई मजदूरी करके पेट भर लूंगा। राजा एक तेली की कोल्हू पर मजदूरी करने लग गया। रानी राजमहल में दासी बनकर रहने लगी। कुछ दिन बाद वही चैत्र कृष्णा दशमी का दिन आया सभी राजा की दासियों रानियों ने स्नान करके व्रत रखने का विचार किया। रानी जो दासी बनी हुई थी उसने भी स्नान कर व्रत रखा। मायके की रानी ने कहा कि ऐ दासी मैं तेरी चोटी गूंथ देती हूं। रानी ने दासी की चोटी गूंथी तो उसे माथे पर पद्मचिन्ह दिखाई दिया, रानी रोने लगी। उसके आंसू दासी की पीठ पर गिरे तो वह बोली रानी साहिबा आप रो क्यो रही हो। रानी ने कहा कि तुम्हारे माथे पर पद्मचिन्ह देखकर मुझे मेरी पुत्री की याद आ गई।

उसके माथे पर भी पद्मचिन्ह था। इस पर दासी ने कहा कि मैं ही आपकी पुत्री ‘दमयन्ती’ हूं। दशा बिगडऩे से आपके यहां दासी बनी। जंवाईजी इसी गांव में तेली के यहां कोल्हू चलाकर जीवन यापन कर रहे हैं। रानी ने पुत्री को गले लगाया। जंवाई को लेकर आई, स्नान कराकर राजशाही वस्त्र पहनाए। पुन: लाव लश्कर, हाथी-घोड़े, नौकर-चाकर स्वर्ण रत्नों के खजाने के साथ विदा किया। उस दिन रानी ने दमयन्ती से दशा माता का व्रत करवाकर उसके बेल बांधी। मित्र का हार खूंटे ने पुन: उगल दिया, बहिन की दोनों रोटियां सोने की हो गई, प्याज चांदी के हो गए, जिनहें खोदकर राजा ने बहिन को भेंट कर दिए। दोनों पुत्रों को भील राजा ने पुन: सुपुर्द कर दिया, राजा रानी पुन: आकर राजगद्दी पर आसीन हो गए। यह सब दशा माता की कृपा से ही सम्भव हुआ। तभी से सभी सुहागिन महिलाएं दशा माता की पूजा करती हैं। पीपल की पूजा करती हैं। एक ही प्रकार का धान भोजन में लेती है। अक्सर गेहूं की रोटी व सब्जी बिना नमक के सेवन करती हैं। यह परम्परा पौराणिक काल से चली आ रही है। इस दिन दश धागो को मेलकर दश गांठे लगाकर बेल को महिलाएं गले में धारण करती हैं। पुरानी बेल को पीपल के पेड़ पर चढ़ाती हैं।
पूजा विधि
हिन्दू धर्म में दशा माता की पूजा तथा व्रत करने का विधान है। माना जाता है कि जब मनुष्य की दशा ठीक होती है तो सभी कार्य अनुकूल होते हैं। किन्तु जब प्रतिकूल होती है तो बहुत परेशानियां होती है। इन्हीं परेशानियों से निजात पाने के लिए यह व्रत महिलाएं करती हैं। 1. यह व्रत चैत्र कृष्णा दशमी को किया जाता है।
2. सुहागिन महिलाएं यह व्रत अपने घर की दशा सुधारने के लिए करती हैं।
3. इस दिन कच्चे सूत का दश तार का डोरा लेकर दश गांठें लगाती हैं, पीपल की पूजा करती हैं।
4. इस डोरे को पूजन के बाद पूजा स्थल पर महिलाएं नल-दमयन्ती की कथा सुनती हैं।
5. इसके बाद डोरे के गले में बांधती हैं।
6. पूजन के बाद महिलाएं अपने घरों पर हल्दी तथा कुमकुम के छापे लगाती हैं।
7. एक ही प्रकार का अन्न एक समय खाती हैं।
8. भोजन में नमक नहीं होना चाहिए।
9. विशेष रूप से अन्न में गेहूं का ही उपयोग करते हैं।
10. घर की सफाई करके जरूरत के सामान के साथ झाडू इत्यादि खरीदती हैं।
11. यह व्रत जीवन भर किया जाता है। इसका उद्यापन नहीं होता है।

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