संविधान जड़ वस्तु नहीं बल्कि गतिशील दस्तावेज: कोविंद

नई दिल्ली। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा है कि संविधान कोई जड़ वस्तु नहीं बल्कि यह एक गतिशील दस्तावेज़ होता है और उसे देश की जनता के लिए सार्थक बनाये जाने की जरूरत है।

श्री कोविंद ने आज यहां संविधान दिवस के मौके पर उच्चतम न्यायलय की ओर से आयोजित समारोह का उद्घाटन करते हुए यह बात कही।
इस अवसर पर उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश तथा अधिवक्ता मौजूद थे।

राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान सभा को मालूम था कि संविधान में नए बदलाओं की जरूरत पड़ेगी और एक गतिशील दुनिया में देश की जनता की सेवा करने का यही उचित रास्ता है।
यही कारण है कि संविधान में समय- समय पर कई वर्षों में कई संशोधन भी हुए।
उन्होंने कहा कि संविधान एक अमूर्त आदर्श नहीं है बल्कि उसे हर गली मोहल्ले और गाँव में आम आदमी की जरूरतों के अनुरूप सार्थक होना होगा, लोगों से जुड़ना होगा तथा अधिक अनुकूल होना होगा।

उन्होंने कहा कि संविधान की आत्मा विश्वास है।
यह विश्वास एक-दूसरे में हो, एक दूसरी संस्थाओं में हो, एक-दूसरे की अच्छाइयों में हो और भावी पीढ़ी के विवेक पर भी विश्वास हो।
उन्होंने कहा कि जब केंद्र सरकार, राज्य सरकारें को वित्तीय अधिकारों का विकेंद्रीकृत करती हैं तो हम संविधान की संघीय भावना के अनुरूप काम करते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने यह महसूस किया था कि संविधान चाहे कैसा भी लिखा जाये वह तब तक सार्थक नहीं होगा जब तक जनता के अधिकारों को लागू न किया जाये और उसके मूल्यों की रक्षा न हो।
उन्हें भरोसा था कि भावी पीढियां इसका पालन करेंगी लेकिन जब संस्थान और लोग यह सवाल करते हैं कि संविधान ने उनके लिए क्या दिया तब उन्हें भी सोचना चाहिए कि उन्होंने संविधान के मूल्यों की रक्षा के लिए क्या किया है।

उन्होंने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में ही लिखा है “हम यानी जनता ही संविधान हैं”।

श्री कोविंद ने कहा कि संविधान ने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण के लिए एक मंच तैयार किया है जो समानता स्वतंत्रता और भाईचारे के खम्भे पर टिका है।
न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन बनाने के लिए इन खम्भों के साथ संतुलन बनाया जाना जरुरी है।

इसके अलावा स्वतंत्रता और स्वायत्तता की रक्षा करते समय इस बात का ख्याल रखे जाने की जरूरत है कि अधिकारों के बंटवारा करते समय सद्भावना भंग न हो और हम एक- दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण न करें।
लोकतंत्र के इन तीनों खम्भों के बीच सामंजस्य जरूरी है।
उन्होंने कहा कि हमारी प्रतिबद्धता संविधान के मूल्यों की रक्षा करना है तथा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के फलों को आम लोगों तक पहुंचाना है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्र ने राष्ट्रपति को द कान्सटीटूयूशन एट 67 और इंडियन ज्यूडिसिअरी की वार्षिक रिपोर्ट की प्रति भी भेंट की।

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