माटी के लाल

लाजिमी है कि गांवों में काको-सा, दादो-सा के हाथों से मिले चने के झाड़ और भुट्टों में जो अपनापन है वह अंकलजी की टॉफियों में कतई नहीं हो सकती।
– जय एस. चौहान –
जन्मभूमि की मिट्टी की तासीर ही कुछ ऐसी होती है कि जिसे हर कोई नहीं भूलता। सफलता के शिखर को चूमने के बावजूद जन्मभूमि से लगाव बरकरार रखने वाले विरले ही होते हैं। बिजयनगर के सफल उद्यमी और समाजसेवी योगेन्द्रराज सिंघवी इन्हीं में से एक हैं। ऐसे लोग अनुकरणीय होते हैं और होना भी चाहिए। हालांकि सिंघवी का कर्मक्षेत्र मायानगरी मुंबई है, लेकिन उनका लगाव आज भी बिजयनगर से बरकरार है। बेशक, मुंबई में समुंदर की लहरें आंखों को सुकून तो देती होंगी पर आत्मा को नहीं। गांव की गलियों में गुजरने की अनुभूति महानगरों की चौड़ी सड़कों पर सरपट भागते वाहनों में कहां? लाजिमी है कि गांवों में काको-सा, दादो-सा के हाथों से मिले चने के झाड़ और भुट्टों में जो अपनापन है वह अंकलजी की टॉफियों में कतई नहीं हो सकती।

शायद यही अपनापन सिंघवी को हर महीने अपनी जन्मभूमि की ओर खींच लाती है। जन्मभूमि का यह मान तो रखना ही चाहिए। दूसरी बात, सफलता का कोई पैमाना नहीं होता। सफल होने के बाद सबसे पहले कुछ खो जाता है तो वह है विनम्रता। सफलता के साथ विनम्रता का भी समावेश हो तो इसे सोने पे सुहागा कहा जा सकता है। याद रखना चाहिए कि सफलता की घोषणा यदि विनम्रता करे तो कीर्ति दूर-दूर तक जाती है। सिंघवी के व्यक्तित्व में यही विनम्रता समाज में उन्हें अलग पहचान देती है। यह उनसे सीखना चाहिए।

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