पानी की कमी के चलते कुरजां की संख्या घटने लगी

  • Devendra
  • 13/12/2019
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जैसलमेर। (वार्ता) पानी की कमी और अनदेखी के कारण राजस्थान में जोधपुर जिले के फलौदी क्षेत्र के खीचन गांव में पड़ाव डालने वाली प्रवासी पक्षी कुरजां (डेमोसाइल क्रेन) की संख्या घटने लगी है और अब वे नया आशियाना भी ढूंढने लगी है।

कुरजां की घटती संख्या का कारण इन विदेशी पक्षियों के लिए पर्यटन विभाग और पशु पालन विभाग की और से कोई खास प्रबंध नहीं करना भी माना जा रहा है। इन विभागों से पक्षियों के दाने पानी की कोई व्यवस्था नहीं है और नहीं घायल पक्षियों के लिए उपचार की कोई व्यवस्था कर रखी है। साथ तालाब में घटता पानी भी इनकी संख्या में कमी का मुख्य कारण है। इन पक्षियों को अठखेलियों और स्वछंद विचरण के लिए पानी से भरे तालाब चाहिए। मगर इस बार खीचन के तालाब में पानी बहुत कम है। जिसके चलते यहां पहुंचे पक्षियों ने अपने नए आशियाने ढूंढने के लिए उड़ान भर दी। इस कारण बाडमेर जिले के पचपदरा के रेवाडा ,त्रिसिंगाडी और मानसरोवर तालाब पर बड़ी तादाद में कुरजां ने डेरा जमाया है तो जोधपुर के ही बाप तहसील के कुछ तालाबों पर कुरजां ने अपने नए आशियाने बनाये है।।

कुरजां के कारण जैसलमेर-जोधपुर मार्ग पर स्थित फलौदी उपखण्ड का खीचन गांव दुनिया भर में अपनी खास पहचान बना चुका है। स्थानीय तालाबों पर आने वाली लाखों की तादाद में साइबेरियन (डेमोसाइल क्रेन) सदियों से शीतकालीन प्रवास पर छह हज़ार किलोमीटर की दूरी तय कर दल के साथ सितंबर महीने के अंत तक यहां डेरा डालती है। कुरजां के प्रवास के कारण खीचन अपना पर्यटन नक्शे पर खास स्थान बना चुका है। तो पर्यटन विभाग राजस्थान भी अपने प्रचार प्रसार में खींचन और कुरजां को खास तवज्जो देता है। प्रतिवर्ष हजारों की तादाद में पर्यटक कुरजां की अठखेलियाँ देखने खीचन के तालाब पर पहुंचते हैं। इस वर्ष भी खीचन में बड़ी तादाद में साइबेरियन क्रेन इस गांव अपने नियत समय पर पहुंचे थे। मगर सितंबर से लेकर अब तक साइबेरियन क्रेन की संख्या में काफी गिरावट आई है। बुधवार को गांव में बड़ी मुश्किल से तीन चार हजार क्रेन नजर आई जबकि सितंबर में इनकी तादाद काफी थी। साइबेरियन क्रेन की घटती संख्या से पक्षी प्रेमी काफी चिंतिंत और व्यथित है।

राज्य सरकार और जिला प्रशासन द्वारा समय समय पर खीचन को पर्यटनस्थल के रूप में विकसित करने की योजनाएं बनाई गई। मगर कोई भी योजना धरातल पर नही आई। खीचन आने वाले पर्यटकों को कोई सुविधा मुहैया नहीं है। न ही कुरजां के लिए कोई प्रबंध किया गया। केवल स्थानीय जैन समाज के प्रवासियों द्वारा इनके लिए चुगे (दाना पानी) की व्यवस्था की जा रही है। इन क्रेनों को जैन समाज द्वारा संचालित पक्षी चुग्गा घर की और से दिन में दो बार चुग्गा डाला जाता है। इसके लिए धर्मार्थ ट्रस्ट भी बना हुआ है।

गत कुछ महीनों में खीचन में करीब पचास से अधिक कुरजां की मौत भी हो चुकी है। पशु पालन विभाग ने बचाव केन्द्र खोल रखा है। मगर मौके पर टीम का कोई सदस्य नजर नही आया। ग्रामीणों ने बताया कि बचाव टीम वाले कुरजां के बीमार पड़ने पर जयपुर से आते है घायल कुरजां को साथ ले जाते हैं। वन विभाग ने भी रेस्क्यू सेंटर बना रखा है मगर कुरजां के उपचार की व्यापक व्यवस्थाएं इन केन्द्रों पर नही हैं। तालाब में पानी की कमी के कारण कुरजा बीमार पड़ रही है। पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ भगीरथ सोनी ने बताया की रेस्क्यू सेंटर में दो घायल कुरजां का उपचार किया जा रहा हैं,जिसमे एक नवजात और एक व्यस्क है। अब व्यस्क कुरजां पूरी तरह स्वस्थ हैं और अब इसे अन्य कुरजां के साथ छोड़ दिया जायेगा। रेस्क्यू सेंटर में क्षेत्रीय वन अधिकारी बुद्धाराम विश्नोई और पक्षी प्रेमी सेवाराम माली अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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