श्रीमद् भागवत का भावार्थ सहित नित्य पाठ करें

  • Devendra
  • 02/01/2020
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श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञान महायज्ञ सम्पन्न: संत अर्जुनराम महाराज ने कहा
बिजयनगर। स्व. अजय अरोड़ा की पुण्य स्मृति में सत्यनारायण-कृष्णा देवी एवं माधवदास-कांता देवी अरोड़ा परिवार की ओर से आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञान महायज्ञ मंगलवार को पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न हुआ। कथा आयोजक परिवार के विजय अरोड़ा ने बताया कि इस मौके पर श्री बाड़ी माता मंदिर प्रांगण से बैण्ड बाजों के साथ श्रीमद्भागवत जी की शोभायात्रा निकाली गई जो पुन: मंदिर प्रांगण पहुंचकर सम्पन्न हुई। जहां पुर्णाहुति कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसके बाद सभी श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। कथा वाचक संत श्री अर्जुनराम जी महाराज ने प्रथम दिवस श्रद्धालुओं को भगवान की भक्ति और कौन-कौन भगवान की भक्ति करने का अधिकारी है इसके बारे में बताया।

उन्होंने बताया कि सभी जीव परमात्मा के अंश है और उन्हें भक्ति करने का पूर्ण अधिकार है बशर्ते भक्ति बिना स्वार्थ और छल कपट के साथ की गई हो। द्वितीय दिवस कथा में बताया कि जिस किसी की भी मृत्यु निकट हो उसे क्या करना चाहिए। तो संत श्री ने बताया कि मृत्यु अज्ञात है और अटल है। इसके लिए मनुष्य को प्रतिपल बहुत समझ से काम लेना चाहिए। ऐसी अवस्था में इंसान को राग- द्वेष से मुक्त होकर अपने सत्कर्म करते रहने चाहिए। अर्थात ऐसे इंसान को अनन्य रूप से परमात्मा का आश्रय शरणागत करना चाहिए। कथा के तृतीय दिवस प्रत्येक जीव के सुखी रहने के विषय पर बताया कि प्रत्येक इंसान सुखी रहने के लिए कई यत्न करता है लेकिन अन्तत: उसे दु:ख का सामना करना पड़ जाता है।

संत श्री ने कहा कि सुख का मुख्य रूप परमात्मा ही है, जिसे आनन्द सिंधु अर्थात सुखराश्री भी कहते हैं। उससे बिना सम्बंध बनाए इंसान सुखी नहीं हो सकता। जबकि आजकल बाहरी साधनों से व्यक्ति प्रसन्नता और सुख प्राप्त करना चाहता है जिस पर भी वह सुखी नहीं हो पाता है। कथा के चतुर्थ दिवस संत श्री ने फरमाया कि जीवों पर अनुग्रह करके परमात्मा अवतरित होते हैं। इस दौरान जीवों को साधना में लीन करते हैं और जो साधना में असमर्थ होते हैं उन्हें सामूहिक प्रार्थना में प्रेरित कर धर्म रक्षार्थ एवं भक्ति में लीन कर प्रसन्नता प्रदान करने के लिए अवतार लेते है।

कथा के पंचम दिवस भगवान की विविध लीलाओं का विवरण प्रस्तुत किया गया। षष्ठम दिवस असुरों का नाश करने वाली लीलाओं व गोपियों का भगवान श्री कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम का वर्णन किया गया। इस दौरान महाराज ने बताया कि भक्ति दो प्रकार की होती है। पहली भक्ति में भक्त भगवान की भक्ति कर स्वयं सुखी होना चाहता है जबकि दूसरी भक्ति में भक्त भक्ति कर भगवान को सुख देना चाहता है। दूसरी प्रकार की भक्ति गोपियों ने भगवान कृष्ण के लिए की थी। वो भक्ति ही सच्ची भक्ति थी।

कथा समापन के दिवस भगवान श्री द्वारिकाधीश की विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया।इस दौरान भागवत कथा के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत पुराण में भूगोल, इतिहास, विज्ञान, खगोल सभी कुछ है। बस इसे नियमित अध्ययन में लाने की आवश्यकता है। संत श्री ने सभी श्रद्धालुओं से आव्हान किया कि आप अपने घर में नित्य श्रीमद् भागवत का भावार्थ सहित पाठ करें, इससे आपको सुख अवश्य मिलेगा।
जहां प्रेम है वो ही परिवार है
संत श्री अर्जुनराम जी महाराज ने बताया कि एक मकान में सभी सदस्यों के रहने को परिवार नहीं कहा जा सकता। या फिर एक कमरे में रहने वाले पति-पत्नी और बच्चों को परिवार की परिभाषा नहीं दी जा सकती है। परिवार वहां होता है जहां सभी का एकदूसरे में प्रेम हो, सभी को अपने-अपने कर्तव्यों का भान हो और बेखूबी वो सभी प्रेम भाव से अपने कत्र्तव्यों की पालना कर रहे हो। तभी ऐसे समूह को परिवार कहा जा सकता है।

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