डिग्री-डिप्लोमा होल्डर होने के बावजूद गर्व से बेच रहा सब्जी

  • Devendra
  • 13/02/2020
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पटेल कॉलोनी के गोविन्द को भाया पुश्तैनी व्यवसाय
बिजयनगर। ऐसा है सर मैंने कला स्नातक की डिग्री लेने के बाद अजमेर पोलटेक्निक से ऑटोमोबाइल में डिप्लोमा किया। इसके बाद जैसे हर युवा के साथ होता है मेरे साथ भी हुआ। माता-पिता ने कहा तुम्हें पढ़ा लिखा दिया तो अब तुम नौकरी की तलाश करो। नौकरी मिली भी तो गुडगांव (हरियाणा) की एक ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में, लेकिन वेतन प्रस्ताव बहुत कम राशि का था। इस पर मेरे सामने यह प्रश्न चिन्ह था कि अब मुझे क्या करना चाहिए?

कुछ दिन सोचने के बाद मैंने यह ठान लिया कि मुझे अब पिता के सब्जी बेचने के व्यवसाय को संभाल लेना चाहिए। ऐसा मैंने इसलिए तय किया कि घर गुजारा करने के लिए पर्याप्त राशि भी अर्जित कर लूंगा और पिता को मेरे जवान होने पर रिटायर करने का जो सपना मैंने बचपन में देखा था वो भी पूरा कर लूंगा। बस फिर क्या था पिता के सब्जी के ठेले के हत्थों को एक दिन शाम पकड़कर मैंने पिता से साफ कह दिया बस अब बहुत कुछ हो गया आपने हम चार भाई बहनों के लिए बहुत कुछ पसीना बहा लिया अब ये मौका हमारा है। उस दिन से लगातार मैं पीपली चौराहे के निकट ठेले पर सब्जी बेचने का व्यवसाय कर रहा हूं।

यह दास्तां खुद अपनी जुबानी बयां करते समय स्थानीय पटेल कॉलोनी निवासी गोविन्द माली (20) पुत्र तेजमल माली कुछ भावुक सा हो गया। उसने बड़ी मासूमियत के साथ इस खारीतट संवाददाता से यह प्रश्न पूछ लिया कि जाने क्यों मेरे कुछ पढ़े-लिखे ग्राहक मुझे इस बात का उलाहना देने से नहीं चूकते कि भाई जब तूने पढ़ाई करी तो क्या सब्जी बेचने के लिए करी थी? इस पर मेरा एक ही जवाब होता है कि हम बचपन से हमारे बुजुर्गों और गुरुओं से यह सुनते आए हैं कि कंठ की विद्या और अंट का धन कभी जाया नहीं जाता।

अब मेरा ही उदाहरण लीजिए आप मेरे बहुत से ग्राहक ऐसे हैं जो मुझे पेटीएम व फोनपे पर सब्जी का भुगतान करते हैं, ऐसे में मैं अगर पढ़ा लिखा ना होता तो भुगतान नहीं ले पाता और ग्राहक को भी खोना पड़ जाता। गोविन्द का कहना है कि काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। अन्तर तो सिर्फ छोटी और बड़ी सोच का होता है। जीवन में यदि सकारात्मक सोच होगी तो नकारात्मक चीजें अपने आप आपके जीवन से विदा हो जायेंगी। मुझे सब्जी बेचने पर गर्व की अनुभूति होती है और जब सारा माल बिक जाता है ठेला पूरी तरह खाली हो जाता है तो शाम को खुश होकर घर जाता हूं और कमाया हुआ पैसा पिता के सुपुर्द कर देता हूं।
ग्राहक की संतुष्टि ही मेरा ध्येय
जब मैंने शुरुआत में सब्जी बेचना शुरू किया तो कई वैरायटी की सब्जी मैं अपने ठेले पर ले आता था। ऐसे में कभी-कभी सब्जी बच जाती और मुनाफा कम होता या कभी नुकसान हो जाता तो मैं क्या पूरे परिवार के लोग इस बात का अफसोस करते थे। इस पर मैंने कुछ तब्दीली लाने का फैसला किया। इसके बाद से मैंने समझदारी से मंडी में खरीददारी करना शुरु कर दिया। अब मैं एक या दो वैरायटी की सब्जी ही मेरे ठेले पर भरता हूं ताकि ग्राहक को उचित दाम पर बेच सकूं और प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति में भी खड़ा रहूं।

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