चिकित्सालय की सेहत ही नासाज

  • Devendra
  • 05/03/2020
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बिजयनगर में मजाक बना निरोगी राजस्थान अभियान
बिजयनगर स्थित राजकीय चिकित्सालय करीब सात माह से भगवान भरोसे ही चल रहा है। स्थानीय लोगों ने आन्दोलन भी किया लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। स्थानीय विधायक ने आश्वासन भी भरपूर दिया लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही साबित हुआ। हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं लेकिन सुध लेने वाला यहां कोई नजर नहीं आ रहा। अस्पताल के हालात पर खारीतट संदेश की रिपोर्ट…
बिजयनगर। एक ओर जहां राज्य सरकार ने इस वर्ष के बजट में निरोगी राजस्थान अभियान पर विशेष ध्यान देते हुए राज्य भर में चिकित्सा सुविधाओं के लिए नित नए प्रयास करने पर जोर दिया है। वहीं राज्य भर में जनता क्लिनिक खोलने के प्रयास भी तेज किए जा रहे हैं। इसके उलट बिजयनगर के राजकीय चिकित्सालय का स्वास्थ्य पिछले सात माह से नासाज चल रहा है। आलम यह है कि अस्पताल जाने वाले आम लोग यहां व्याप्त अव्यवस्थाओं और डॉक्टरों की कमी से परेशान होकर जनप्रतिनिधियों को जमकर कोस रहे हैं।
पांच माह पूर्व शहर के बाशिंदों ने राजकीय चिकित्सालय बचाओं समिति के नेतृत्व में तहसीलदार को ज्ञापन सौंपकर चिकित्सालय में चिकित्सकों की जल्द नियुक्ति की मांग की थी।

उसके बाद समिति के तत्वावधान में एक दिन का बिजयनगर बंद भी किया गया। साथ ही भाजपा के कैलाश गुर्जर ने भी 6 दिन का आमरण अनशन रखा था। इसके बाद 29 सितम्बर 2019 को सरकार ने राज्यभर में चिकित्सकों के स्थानान्तरण के आदेश जारी किए। उक्त आदेशानुसार बिजयनगर के चिकित्सालय के लिए पांच चिकित्सकों की नियुक्ति आदेश जारी किए गए थे लेकिन आज तक उन पांच चिकित्सकों में से मात्र एक चिकित्सक डॉ. शिवराम मीणा (सर्जन) ने 21 दिसम्बर 2019 को ड्यूटी ज्यॉन की। जॉयनिंग के बाद से उक्त चिकित्सक ने मात्र 30 दिन भी लगातर ड्यूटी नहीं की और वो 28 जनवरी से लगातार अवकाश पर चल रहे थे।

वर्तमान में चिकित्सालय मात्र 5 चिकित्सक जिसमें एक शिशु रोग, एक नेत्र रोग, दो दंत रोग और एक मेडिकल ऑफीसर के भरोसे चल रहा है। ऐसे हालत के चलते यहां का ओपीडी भी खासा प्रभावित हुआ है। इससे जहां गत वर्ष ओपीडी में पर्ची चढ़ाने के लिए संविदा के तीन पद स्वीकृत किए हुए थे वर्तमान में मात्र दो पद ही स्वीकृत हैं। गत वर्ष ग्रीष्मकाल में जहां ओपीडी संख्या 600 से भी अधिक हुआ करती थी वो अब मात्र 425 या इससे अधिक पर ही सिमट कर रह गई है। यदि समय रहते जनप्रतिनिधियों ने अस्पताल की सार संभाल नहीं ली तो हालात और भी बदतर होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
ये होती है सबसे बड़ी समस्या
शहर में लगभग 50 हजार से अधिक की आबादी है साथ ही शहर राष्ट्रीय राजमार्ग के बेहद नजदीक स्थित है। ऐसे में राजमार्ग पर आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं में गंभीर घायलों को यहां अस्पताल में लाया जाता है। लेकिन यहां चिकित्सकीय सुविधाएं नहीं होने से मरीजों को जिला स्तरीय अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है ऐसे में कभी-कभार गंभीर घायलों की रास्ते में जान पर बन आती है। साथ ही चिकित्सालय में पर्याप्त चिकित्सकीय सेवाएं उपलब्ध न होने की वजह से शहर के बाशिंदों को गुलाबपुरा, अजमेर, भीलवाड़ा की ओर रुख करना पड़ रहा है।
75 बेडेड अस्पताल सुविधाओं से महरूम
वर्तमान में अस्पताल 75 बेडेड स्वीकृत है लेकिन जैसी सुविधाएं 75 बेडेड के अस्पतालों में होनी चाहिए उन सुविधाओं से भी महरूम है यहां का अस्पताल। यहां ऐसा नहीं कि सिर्फ चिकित्सकों के पदों की कमी है। कमी तो कार्यालय कर्मियों के साथ अन्य पदों की भी है। यहां एक पद वरिष्ठ लिपिक, एक पद कनिष्ठ लिपिक, एक पद कनिष्ठ लेखाकार और एक पद कार्यालय सहायक का होना चाहिए लेकिन वर्तमान में मात्र एक कनिष्ठ लिपिक और एक कनिष्ठ लेखाकार ही कार्यरत है। ऐसे में कार्यालय के कामकाज पर भी व्यापक असर पड़ रहा है।
नहीं है फिजीशियन की व्यवस्था
किसी भी चिकित्सालय के लिए फिजिशियन और गायनिक विशेषज्ञ का पद अहम होता है लेकिन यहां तो दोनों पद कई माह से रिक्त हैं। गत वर्ष 31 जुलाई को डॉ. गोपाल जोशी (फिजिशियन) के सेवानिवृत होने के बाद कोई फिजिशियन चिकित्सक यहां पदस्थ नहीं हुआ। साथ ही 30 सितम्बर 2019 को डॉ. मधु जोशी (महिला रोग विशेषज्ञ) के सेवानिवृत होने के बाद से किसी महिला रोग चिकित्सक को यहां नियुक्त नहीं किया गया। ऐसे में गत वर्ष सितम्बर माह से पूर्व में जहां प्रतिमाह 125 से 150 प्रसव हुआ करते थे वो अब मात्र 25-30 प्रसव की संख्या में सिमट गए हैं।
मिले तो सिर्फ आश्वासन
क्षेत्रवासियों का कहना है कि राजकीय चिकित्सालय की दुर्दशा को लेकर जब-जब जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई तब हमेशा एक नया आश्वासन मिलता रहा। कभी मंत्री जी से बात करने का तो कभी संविदा पर डॉक्टर्स लगाने का। लेकिन आज दिन तक कुछ भी नहीं हुआ।
महिला रोगियों को होती है अधिक परेशानी
चिकित्सालय में गायनिक विशेषज्ञ की सेवाएं नहीं होने की वजह से महिला रोगियों को खासी परेशानी होती है। ऐसे में मौजूद चिकित्सकों द्वारा सामान्य परेशानियों की जांच कर उपचार किया जाता है। विशेष रोग की परिस्थिति में जिला स्तरीय अस्पताल में रेफर किया जाता है।

डॉ. धनभाग भाटी, दंत रोग विशेषज्ञ, राज.चिकि., बिजयनगर
ड्यूटी शिविर में….
सरकार की ओर से गत वर्ष सितम्बर माह में यहां पांच चिकित्सकों की नियुक्ति के आदेश जारी किए गए थे। उनमें से एक चिकित्सक सर्जन ने दिसम्बर माह में ज्याइन तो कर लिया लेकिन उनकी अधिकतर शिविरों में ड्यूटी लग रही है। वहीं शेष चार डॉक्टरों के नहीं आने से व्यवस्थाएं जस की तस है। अगर डॉक्टर्स आ जाएं तो रोगियों को बेहतर चिकित्सकीय सेवाएं मिल पाएगी।

डॉ. प्रदीप गर्ग, चिकित्सा प्रभारी, राजकीय चिकित्सालय, बिजयनगर
परहेज करने लगे मरीज
राजकीय चिकित्सालय में चिकित्सकों की कमी के चलते क्षेत्रवासी यहां आने से परहेज करने लगे हैं। पूर्व में जहां ओपीडी भी अच्छा चलता था तो वार्ड भी मरीजों से भरा रहता था, लेकिन गत वर्ष अगस्त माह से यहां सब कुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा है। वार्डों में मुश्किल से कोई एक-दो मरीज ही भर्ती नजर आते हैं। ऐसे में मजबूरन क्षेत्रवासियों को निजी चिकित्सालयों की शरण लेनी पड़ रही है।

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