महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव

  • Devendra
  • 06/04/2020
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बिजयनगर। विश्व में जब कोरोना संक्रमण महामारी का रोग फैल रहा है। इसी बीच चैत्र शुक्ला तेरस का दिवस 6 अप्रेल 2020 सोमवार को आया है, इसी दिन तीर्थंकर प्रभू श्रमण भगवान महावीर का ईस्वी पूर्व 566 वर्ष जन्म हुआ था। इस दिवस को विश्व भर में जैन धर्म अर्थात भगवान महावीर के द्वारा मानव मात्र के कल्याण के लिए फरमाई गई जिनवाणी/आगमवाणी को मानने वाले उनके अनुयायी महावीर जन्म कल्याणक दिवस को विशेष धर्म आराधना, साधना, त्याग तपस्या के द्वारा उपदेशित मुख्य बातों का यथा अहिंसा-दया-करुणा का पालन, सत्यनिष्ठा और मिठास से बोलना, अचौर्य-न्यायनीति व ईमानदारी से सभी कार्य करना तथा ब्रह्मचर्य-शीलधर्म का पालन एवं अपरिग्रह वस्तुओं पर मूच्र्छाभाव न रखना, अप्राप्त की वांछा न करना, प्राप्त में संतोष करना आदि का मन से, वचन से और काया से विश्व के सब मान/प्राणी जीवन में उतारे/आचरण में लावें तो निश्चित ही ऐसे महामारी का रोग आएगा ही नहीं और कदाचित आ गया तो इसकी पालना की जाए तो शीघ्रातिशीघ्र दूर हो सकता है।

आओ हम सब मिलकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक दिवस को हषोल्लास के साथ साधना-आराधना, त्याग और तपस्या के साथ मनाएं। एक दूसरे से उचित दूरी बनाएं, हाथ साफ रखें, रोग हो जाए तो चिकित्सक को अवश्य बताएं। अनन्त अनन्त उपकारी सर्वज्ञ सर्वदर्शी तीर्थंकर प्रभू महावीर ने संसारी प्राणियों के उद्वार, उत्थान और कल्याण के लिए दुर्लभ जिनवाणी फरमायी है जो भव्य प्राणी भगवान की वाणी पर श्रद्धा, प्रतीति और रूचिकर तदुनासार आचरण करते हैं वे मोक्ष के अव्याबाध सुखों को प्राप्त करते है। ऐसे वीर प्रभु महावीर का आज जन्म दिवस है। इस जन्म दिन को मनाना तब ही सार्थक होगा जब भगवान द्वारा बताएं गए सिद्धांतों को हम अपने जीवन में लाएंगे तदानुसार जीवन जीएंगे।

राजा सिद्धार्थ की रानी त्रिशला के गर्भ में जब महावीर जीव आया था तब देश में सभी तरह की वैभव में वृद्धि हुई थी अत: उनका नाम वर्धमान रखा गया। जन्म के साथ ही सम्पूर्ण लोक प्रकाशमान हो गया था यहां तक की नरक में भी क्षण भर के लिए दु:ख दूर हुआ और सुख हुआ था। देवी देवता, इन्द्र-इन्द्राणी भी जन्मोत्सव (जन्म कल्याणक) मनाने शिशु को मेरू शिखर पर ले गये और नानाविध उनका अभिषेक करके कल्याणक मनाया था। अभिषेक करके कल्याणक मनाया था। अभिषेक करते शिशु को कष्ट न होने पावे ऐसी शंका इन्द्र-देवता आदि के करने पर शिशु ने अपने पांव का अगूंठा मेरू शिखर पर लगा कर दबाते ही शिखर कम्पायमान हो गया। देवताओं की शंका दूर हुई। बालक की वीरता देखकर उसका नाम महावीर रखा गया।

जन्म से ही बालक तीन ज्ञान के धनी थे। युवावस्था में उन्होंने स्वयं ने संयम ग्रहण करके साढ़े बारह वर्षों तक घोर साधना करी। केवल ज्ञान प्राप्त करके प्राणी मात्र के कल्याण के लिए जिनवाणी फरमाई जो आगमवाणी भी कहलाती है। भगवान के द्वारा फरमाई गई वाणी के अनुसार जीवन जीने वाले, मानने वाले जैन कहलाते हैं। कोई भी जाति का व्यक्ति भगवान की वाणी का लाभ अपने जीवन में ले सकता है। जो अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह इन पांच बातों का जीवन आचरण में लाता है वही व्यक्ति सच्चा जैन कहलाने का अधिकारी है। आओ आज हम सब मिलकर भगवान के सिद्धान्तों को जीवन आचरण में लाएं, ऐसा संकल्प लें तभी भगवान का जन्म दिवस मनाना सार्थक होगा। आडम्बर, दिखावा प्रदर्शन आदि से बचें। भगवान महावीर का दिव्य सन्देश ‘जीओ और जीने दो’ तथा अहिंसा परमोधर्म: का अक्षरश: पालन करते हुए इस संदेश को अधिक से अधिक प्रसारित-प्रचारित करें।
साभार : घेवरचन्द जैन

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