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बिजयनगर व गुलाबपुरा सहित आसपास के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या अब धीरे-धीरे नगण्य होती जा रही है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि इस क्षेत्र में लोग बीमार नहीं पड़ रहे। सच तो यह है कि सरकारी चिकित्सालयों में चिकित्सकों की हड़ताल के कारण वे निजी चिकित्सालयों में मोटी फीस देकर अपना उपचार करा रहे हैं।
– जय एस. चौहान –
प्रदेश में जन सरोकार से जुड़े अहम दो मुद्दों पर इन दिनों अवाम में नाराजगी स्पष्ट दिख रही है। अव्वल तो यह कि अवाम की सेहत इन दिनों या भगवान भरोसे है या फिर निजी चिकित्सालयों के भरोसे। दूसरा यह कि सरकारी स्कूलों को पीपीपीडी मोड चलाने का स्थानीय लोगों ने विरोध जताना शुरू कर दिया है।

मरीजों व उनके परिजन नाराजगी जाहिर करने बजाय उपचार के लिए चक्कर लगा रहे हैं। बचत पर चोट पड़ रहा है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि सरकारी चिकित्सालयों में हड़ताल से उनके मन में आक्रोश नहीं है। चिकित्सकों की हड़ताल के कारण अब तक पांच लोगों की मौत हो चुकी है और दर्जनों मरीजों की हालत खराब होती जा रही है।

बिजयनगर व गुलाबपुरा सहित आसपास के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या अब धीरे-धीरे नगण्य होती जा रही है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि इस क्षेत्र में लोग बीमार नहीं पड़ रहे। सच तो यह है कि सरकारी चिकित्सालयों में चिकित्सकों की हड़ताल के कारण वे निजी चिकित्सालयों में मोटी फीस देकर अपना उपचार करा रहे हैं।

चिकित्सकों की मांगें उचित हैं तो उस पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सभी के हित में है। इसी तरह धरती के भगवान से नवाजे जाने वाले चिकित्सकों को भी हठधर्मिता छोड़ कर मरीजों की सेवा में जल्द से जल्द लौट जाना चाहिए। जनता की दूसरी नाराजगी सरकारी स्कूलों को पीपीपीडी मोड पर चलाने को लेकर है।

स्थानीय लोगों की नाराजगी काफी हद तक जायज भी है। सरकार का यह फरमान कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या पीपीपीडी मोड के बहाने सरकारी स्कूलों का निजीकरण तो नहीं किया जा रहा? पीपीडी मोड से क्या सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में निखार आएगा? इस तरह कई प्रकार के संदेह आमलोगों के जेहन में उभर रहे हैं, जिसे सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। सरकारी स्कूलों को पीपीपीडी मोड पर चलाने के पीछे सरकार की मंशा क्या है, इसका खुलासा भी किया जाना चाहिए।

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