जिन शासन का मूल विनय ही है: जिनांगयशविजय जी म.सा.

  • Devendra
  • 29/07/2021
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बिजयनगर। (खारीतट सन्देश) नवकार मंत्र में सबसे पुराना शब्द है ‘नमो’ नमोत्थुणं सूत्र में भी सबसे पहले ‘नमो’ शब्द का संयोजन है। चातुर्मास में जिस ग्रंथ के ऊपर प्रवचन चलेंगे उसमें भी सबसे प्रथम शब्द ‘नमो’ है। ‘नमो’ शब्द का सामान्य से मतलब होता है नमस्कार, लेकिन यह ‘नमो’ शब्द विविध भावों का सूचक शब्द है। यह बात गत दिवस श्री संभवनाथ जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रंयास प्रवर जिनांगयशविजय जी म.सा. ने कही। उन्होंने कहा कि नमो शब्द विनय का सूचक है। शास्त्र में बताया है कि जिनशासन का मूल ही विनय है। विनय के द्वारा ही जीव संचत बनता है। जिसके जीवन में विनय नहीं होता उसके जीवन में न तो तपस्या विकसित हो सकती है, न तो धर्म पनप सकता है। वि-विशेषता, नय- दूर ले जाना। अर्थात् विशेषता जिससे पापकर्म दूर होते हैं उसे विनय कहा जाता है।

देव गुरु वगैरह के प्रति नमस्कार का भाव विनय है। लेकिन उस विनय की शुरुआत सबसे पहले अपने घर से होती है। घर में स्थित अपने माता-पिता बुजुर्ग का जो विनय नहीं करता है, उनकी संभाल नहीं करता है, उनकी सेवा के प्रति आंख-मिचौनी करता है तथा दूसरी ओर मंदिरों में ठाठ-बाट से पूजा पढ़ाता है, गुरु को प्रतिदिन वंदन करता है… ऐसा जीव स्वयं अपने आपको धोखा दे रहा है। उनकी देव गुरु की भक्ति फलदायक तो नहीं बनती प्रत्युत ज्ञानी की दृष्टि में हास्यास्पद बन जाती है। सिर्फ हाथ जोड़कर सिर झुकाना द्रव्य विनय है, लेकिन हृदय में आदर-अहोभाव बढ़ाकर सिर झुकाने से भाव विनय होता है। म.सा. श्री ने फरमाया कि ‘नमो’ शब्द संकोच का सूचक है। हाथ- पैर-सिर इन सर्द अंगों का संकुचन करके नमस्कार होता है। सिर्फ अंगों का संकोच करना द्रव्र्य संकोच है, लेकिन विषयों के प्रति भटकते हुए अपने मन को वहां से संकुचित करके अपनी आत्मा की ओर झुका देना उसे भाव संकोच कहा जाता है। हमारा मन प्रतिपल किसी न किसी इन्द्रिय के विषय में जुड़ा रहता है, वहां से मन को मोड़कर आत्मतत्व को उजागर करने के लिए देव-गुरु के चरणों में मन को झुका देना ही नमस्कार का तात्विक अर्थ है।

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