अथ श्री गुरुवै नम:

पांच-छह दशक बाद भी यदि शिष्यों के स्मृति-पटल पर स्व. ढाबरियाजी की यादें विद्यमान हैं तो एक गुरु के लिए यह गुरु-दक्षिणा अनमोल है। इस गुरु-दक्षिणा का क्षय नहीं हो सकता।
– जय एस. चौहान –
कभी-कभी किसी व्यक्तित्व पर लिखते हुए कलम ठिठक-सी जाती है। खासकर तब जब गांधी शिक्षण संस्थान के संस्थापक प्राध्यापक स्व. मोहनलालजी ढाबरिया के दैदिप्यमान व्यक्तित्व पर लिखना हो।

खारीतट संदेश अनुशासनप्रिय आभाजडि़त स्व. ढाबरियाजी के व्यक्तित्व पर अग्रलेख लिख कर गौरवान्वित महसूस कर रहा है और उनके प्रति आदरांजलि के ‘शब्द-रूपी’ पुष्प अर्पित कर स्व-धन्य भी हो रहा है। इस उम्मीद के साथ कि नेपथ्य से उनका आशीष इन शब्दों के ‘कलमकार’ को मिलता रहेगा।

उनके व्यक्तित्व-रूपी आईने की चमक को वक्त का धूल मलीन नहीं कर सका है। देश भर में फैले उनके हजारों शिष्यों के स्मृति-पटल पर अनुशासन, न्यायप्रियता, नैतिकता और समर्पण का भाव लिए आज भी स्व. ढाबरिया एक शिक्षक के रूप में कायम हैं।

पांच-छह दशक बाद भी यदि शिष्यों के स्मृति-पटल पर स्व. ढाबरियाजी की यादें विद्यमान हैं तो एक गुरु के लिए यह गुरु-दक्षिणा अनमोल है। इस गुरु-दक्षिणा का क्षय नहीं हो सकता। शिक्षा में व्यावसायीकरण के इस युग में स्व. ढाबरियाजी की तरह ही गुरु-दक्षिणा के लिए शिक्षकों को पूरी नैतिकता के साथ समर्पण भाव चाहिए।

यह समर्पण का भाव न तो उधार लिया जा सकता है और न ही खरीदा जा सकता है। … और न ही मोटी फीस लेकर शिष्यों में शिक्षक के प्रति उस भाव का समावेश किया जा सकता है। स्व. ढाबरियाजी के आचरण का अनुशरण ही किया जाए तो बहुत हद तक गुरु की गरिमा को बरकरार रखा जा सकता है।

दरअसल, स्व. ढाबरिया का व्यक्तित्व शिक्षा के क्षेत्र में उस आईने की तरह है जिसमें हर शिक्षक और शिक्षाविद् को अपना अक्स ‘निहारना’ चाहिए। इस कसौटी पर खरा उतरने के लिए आत्मबल तो चाहिए ही आत्मावलोकन भी जरूरी है। भारतीय समाज में गुरु का स्थान देवता से भी ऊपर रखा गया है। स्व. ढाबरियाजी के लिए ‘अथश्री गुरुवै नम:’ के साथ अपने शब्द को विराम देता हूं।

प्रणाम

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com
Skip to toolbar