आदरांजलि: छात्रों के सर्वांगीण विकास के प्रति समर्पित थे स्व. मोहनलालजी ढाबरिया

गुलाबपुरा स्थित गांधी स्कूल के संस्थापक शिक्षाविद् (प्रधानाध्यापक) स्व. मोहनलालजी ढाबरिया के व्यक्तितव पर प्रकाश डालना सूरज के समक्ष दीया दिखाने जैसा है। स्व. ढाबरियाजी के व्यक्तित्व को कागज के एक पन्ने पर समेटना मुश्किल है। फिर भी विनम्रता एवं सम्मान के साथ ‘खारीतट संदेश’ स्व. ढाबरियाजी के व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है। यह आदरांजलि है एक ऐसे शिक्षक को जिन्होंने ‘गुरु’ की गरिमा को ऊंचाइयां दी हैं। खारीतट संदेश ने स्व. ढाबरियाजी के सान्निध्य में शिक्षा प्राप्त कर देशभर में फैले पूर्व छात्रों की राय भी ली। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट…

ढाबरिया का शिक्षा के प्रति समर्पण और आदर्श
स्व. ढाबरिया साहब पढ़ाई को लेकर बहुत जागरूकता रखते थे। परीक्षा के दिनों में वह रात्रि समय 7 बजे से लेकर 9 बजे तक प्रत्येक बच्चे के घर जाकर देखते थे कि बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं या नहीं। स्कूल में पढऩे वाले विद्यार्थियों के माता-पिता और अभिभावकों को ढाबरिया साहब व्यक्तिगत तरीके से जानते थे।

ढाबरिया साहब की सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने शिक्षक रहते हुए अपनी स्नातक और स्नाकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। उनका मूल आदर्श सिर्फ एक ही था। विद्यालय के लाल साहब बताते हैं कि ढाबरिया साहब हमेशा एक ही बात बोलते थे कि मेरा भगवान इन बालकों में ही है।

इस ध्येय को केन्द्र में रखते हुए सम्पूर्ण शिक्षा व प्रशासन व्यवस्था को सफलतापूर्वक संचालित किया। यहां अध्ययन कर चुके छात्र-छात्राएं भारतीय प्रशासनिक, राज्य प्रशासनिक सेवाओं में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इस विद्यालय के सैकड़ों छात्र-छात्राएं देश ही नही विदेशों में भी डॉक्टर, इंजीनियर, सीए और प्रमुख उद्यमी बनकर स्कूल के साथ-साथ देश का नाम रौशन कर रहे हैं।

स्व. मोहनलालजी ढाबरिया का व्यक्तित्व
संस्था के प्रति स्व. ढाबरियाजी का जबरदस्त समर्पण था। वे अत्यधिक अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। उनके समय में छात्र ही नहीं अभिभावक भी उनकी कार्यकुशलता के कायल थे। वे एक अच्छे खिलाड़ी रहे व प्रतिदिन खेल मैदान पर आकर विद्यार्थियों के साथ खेला करते थे। प्रतिवर्ष विद्यार्थियों को शैक्षणिक भ्रमण पर ले जाना उनकी रुचि थी।

जब वे विद्यालय से घर जाते थे तब शहर में जितने भी व्यवसायी होते वे सब उन्हें देखकर उनके सम्मान में खड़े होकर प्रणाम करते थे। एक बार ढाबरिया साहब के समय सांसद साहब रमेशचन्द्र व्यास के पुत्र अनिल व्यास यहां पढऩे आए थे। उन्होंने अनुशासनहीनता की तो ढाबरिया साहब ने अनिल को सामूहिक प्रार्थना सभा में सबके सामने कहा कि आप अपने पिताजी को बुलाकर लाएंगे तभी आप स्कूल में पढ़ सकते हैं।

इस पर सांसद साहब ने ढाबरियाजी को अपने नहीं आ पाने की असमर्थता जताते हुए चिठ्ठी लिखी। उन्होंने लिखा, ‘ढाबरिया साहब, आप इस चिठ्ठी को मेरा व्यक्तिगत निवेदन समझें और बच्चे को आपके सान्निध्य में ही पढऩे का अवसर प्रदान करें तो बड़ी कृपा होगी।’

इसलिए ढाबरिया साहब के लिए अनुशासन बनाए रखने के सिद्धान्त में क्या छोटा, क्या बड़ा, सब एक समान थे।

गांधी स्कूल का इतिहास 
20 अप्रेल 1938 में गुरुदेव पन्नालाल जी म.सा. एवं सोहनलाल जी म.सा. की आज्ञा से 4 छात्रों के साथ नानक जैन छात्रावास के खपरैल (कैलू की छत से बना बरामदा) में स्व. मोहनलाल जी ढाबरिया ने गांधी स्कूल की स्थापना की। धीरे-धीरे यह विद्यालय 1941 तक उच्च प्राथमिक विद्यालय के रूप में स्थापित हुआ एवं 1951 में माध्यमिक शिक्ष बोर्ड द्वारा हाई स्कूल के रूप में क्रमोन्नत हुआ , वर्ष 1956 में उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्तर पर क्रमोन्नत हुआ।

इसी वर्ष विद्यालय भवन का निर्माण कार्य भी जनसहयोग से शुरू हुआ। 1960 में विद्यालय छात्रावास का निर्माण हुआ। आज जो गांधी स्कूल दिखता है वह स्व. ढाबरिया साहब के कार्यकाल में ही बनकर तैयार हुआ था। वर्तमान में जनप्रतिनिधियों के सहयोग से निर्माण कार्य चल रहे हैं। वर्तमान में कक्षा 1 से कक्षा 12वीं तक कुल 725 छात्र/छात्राएं अध्ययनरत हैं।

अधिकांश विद्यार्थी गरीब/मजदूर/किसान एवं अल्प आय वर्ग के हैं। विद्यालय का न्यूनतम शिक्षण शुल्क 2500 रुपए और अधिकतम शिक्षण शुल्क 8000 रुपए है। विद्यालय में कुल 40 कर्मचारी कार्यरत हैं।

उपराष्ट्रपति व मुख्यमंत्री आ चुके हैं यहां
भारत सरकार ने शिक्षक दिवस पर 1962 में राष्ट्रपति पुरस्कार शुरू किया तब उसी सूचि में स्व. मोहनलालजी ढाबरिया भी सम्मानित हुए थे। 1965 में विद्यालय के रजत जयंति कार्यक्रम में स्व. ढाबरिया साहब के विशेष आमंत्रण पर पूर्व राष्ट्रपति तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन एवं प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. मोहनलाल सुखाडिय़ा यहां पधारे थे।

विद्यालय के 75 वर्ष पूर्ण होने पर 15 जनवरी 2015 को समारोह आयोजित किया गया जिसमें तत्कालीन केन्द्रीय जलसंसाधन राज्य मंत्री प्रो. सांवरलाल जाट जो कि इस विद्यालय के पूर्व छात्र हैं पधारे और बोर्ड चेयरमैन चौधरी साहब भी उनके साथ उपस्थित हुए।

जैसा कि गांधी स्कूल के प्रधानाध्यापक सत्यनारायण अग्रवाल ने बताया..

गुरुजी, मुझे पढ़ाई यहीं करनी है…
मैं पहले भीलवाड़ा जिले के सुवाणा कस्बे में पढ़ता था। मैंने सोचा किसी अच्छे स्कूल में पढ़ा जाय। तभी मैंने गुलाबपुरा गांधी स्कूल का नाम सुना और प्रधानाचार्य ढाबरिया साहब के बारे में तो मैंने तुरंत पिताजी को बताया और खुद अकेला ही यहा पढ़ाई करने चला आया।

ढाबरिया साहब ने कहा तुम्हारे पिताजी कहां हैं तो मैंने उन्हें सहज ही कह दिया कि गुरुजी मुझे पढ़ाई यही करनी है और मैं पिताजी की अनुमति लेकर ही आया हूं। उस समय मैंने वर्ष 1956 में कक्षा 9 में प्रवेश लिया था और 1959 में कक्षा 11 उत्तीर्ण करके चला गया। मैं चूंकि जैन हॉस्टल में रहता था तो हॉस्टल का भी स्टूडेंट प्रेसीडेंट था और विद्यालय में भी स्टूडेंट प्रेसीडेंट चुना गया था।

मुझे अच्छे से याद है कि हमारे ढाबरिया साहब अनुशासन प्रिय थे हॉस्टल में कुआं हुआ करता था उसपर जब हम कपड़े धोते थे तो वहीं गुरुजी भी आकर अपने कपड़े धोते थे। हम लोग गुरुजी से निवेदन करते कि गुरु आपके कपड़े हमें दे दीजिए लेकिन वो कहते इंसान को खुद का कार्य खुद ही करना चाहिए। ढाबरिया साहब खेलकूद को भी स्कूल में महत्वपूर्ण स्थान देते थे।

देवेन्द्र कोठारी, पूर्व छात्र जयपुर

स्कूल का अनुशासन आज भी काम आ रहा है
ढाबरिया जी बहुत ही अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे। बच्चों को डर लगता था कि अगर कोई गलती हो गई तो ढाबरियाजी सर छोड़ेेंगे नहीं। जो संस्कार, अनुशासन हम लोगों ने गांधी स्कूल से सीखा है हम लोगों के आज भी काम आ रहा है और आगे भी आता रहेगा।

क्योंकि हमने अनुशासित रहना उसी समय से ही सीख लिया था। विद्यालय के किसी भी बच्चे में इतनी हिम्मत नहीं थी कि कोई विद्यालय का अनुशासन तोड़ सके। ढाबरियाजी ने अपने विद्यार्थियों को ऐसा अनुशासन और संस्कार का पाठ पठाया है जो कि आज अपनी स्कूल और परिवार का मान बढ़ा रहे हैं।

गजेन्द्रसिंह सिंघवी, व्यवसायी, नई दिल्ली

स्वच्छ वातावरण पसंद था उन्हें
ढाबरिया जी अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे वो बच्चों के सर्वांगीण विकास को लेकर अच्छी खासी योजना बनाया करते थे। साथ ही सप्ताह के आखिरी दिन पूरे साल एक पिरीयड विद्यालय में साफ सफाई का रखा करते थे।

उन्हें स्वच्छ वातावरण बेहद अच्छा लगता था। ढाबरियाजी बच्चों से बहुत प्रेम रखते थे। उनके साथ-साथ पूरा स्टॉफ भी बहुत अच्छा था। एक बार की बात है कक्षा में एक बच्चे को म्यूजिक वाले सर ने पिटाई कर दी, उसकी शिकायत लेकर मैं ढाबरिया साहब के पास पहुंच गया तो गुरुजी कहा तुम कक्षा में जाओ मैं स्वयं आकर देखता हूं और उन्होंने आकर देखा भी।

हालांकि ढाबरिया साहब भी बच्चों को गलती करने पर पीटते थे लेकिन हम लोगों को उनकी पिटाई में प्यार और अनुशासन दिखाई देता था। गुरुजी बिल्कुल साफ मन के व्यक्ति थे।

दामोदर तोषनीवाल, पूर्व छात्र एवं व्यवसायी, कलकत्ता

स्कूल का अनुशासन आकर्षित करता था
मैंने 1960 में हायर सैकण्डरी उत्तीर्ण कर ली थी। उस समय हमारे बैच के 15-20 छात्र-छात्रा आज अच्छी जगह पहुंच गए हैं। उस समय में विद्यालय तो चित्तौड़, भीलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, उदयपुर भी हुआ करते थे फिर भी अधिकतर बच्चे गांधी स्कूल में ही शिक्षा पूर्ण करने आते थे। क्योंकि गांधी स्कूल का अनुशासन और संस्कारमयी शिक्षण वातावरण ने कई बच्चों को आकर्षित करता था।

यही वजह रही कि उस समय में गांधी स्कूल ख्यातिप्राप्त विद्यालय था। मैंने ढाबरिया साहब के साथ ज्याद समय व्यतीत किया क्योंकि जहां ढाबरिया साहब रहते थे उसी मकान में मैं किराये पर रहता था। इससे मुझे उनके साथ रहना का मौका ज्यादा मिला।

कन्हैयालाल चण्डक, पूर्व छात्र एवं सीए , नई दिल्ली

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