वीणा का मधुर नाद से संसार के समस्त जीव जन्तुओं को मिली वाणी

  • Devendra
  • 22/01/2018
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बसंत पंचमी का पौराणिक महत्व
बिजयनगर। सृष्टि के आरम्भ में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। जीवों की रचना से ब्रह्माजी संतुष्ट थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से पृथ्वी पर जल छिड़का। पृथ्वी पर जल के छीटे पड़ते ही उनमें कम्पन होने लगा। उसके बाद वृक्षों के झुरमुट में एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ।

यह स्वरूप एक चतुर्भुजी सुन्दर स्त्री का था, जिसके एक हाथ में वीणा दूसरा हाथ ज्ञान मुद्रा में था। अन्य दो हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुर नाद बजाया, संसार के समस्त जीव जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई।

जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन की ध्वनि सरसम्वत के रूप में प्रकट हो गई। तब ब्रह्मा ने उस देवी को ‘वाग् देवी सरस्वती’ के नाम से पुकारा। अत: तभी से सरस्वती को वागेश्वरी, वाग्देवी, मां शारदा, वीणावादिनी और वीणापाणि आदि नामों से पूजा जाने लगा।

यह देवी विद्या और बुद्धि को देने वाली मानी जाती है। संगीत की ध्वनि उत्पन्न करने के कारण यह संगीत की देवी भी मानी जाती है। ब्रह्मा ने कमण्डल से जल छिड़क कर माघ शुक्ला 5 पंचमी को इस देवी की उत्पत्ति की। अत: हम बसंत को सरस्वती के जन्म दिन के रूप में मनाते आ रहे हैं।

ज्योतिष विद्यान की दृष्टि से ‘बसंत पंचमी’ का दिन ‘अबूझ मुहुर्त’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन जो भी शुभ कार्य किया जाता है। बिना किसी मुहुर्त के ही उस कार्य में ‘मां शारदा’ के आशीर्वाद से सिद्धि प्राप्त हो जाती है।

पर्यावरण के क्षेत्र में बसंत पंचमी का महत्व
प्राचीन भारत में ऋतुओं को छ: भागों में बांटा गया। जिसमें बसंत लोगों को सबसे मनचाहा मौसम था। इस ऋतु में सभी पुष्पों, लता, बेलों एवं पेड़ पौधों पर बहार आ जाती है। खेतों में हरित क्रांति एवं पील क्रांति आ जाती है। सरसों के खेतों में पीले पुष्प खिलकर पील क्रांति का रूप ले लेते है।

जौ एवं गेहूं की बालियां निकलने लगती है। आम्र मंजरी से चारों ओर वातावरण सुगंधित हो जाता है। हर तरफ रंग बिरंगी तितलियां रंग बिरंगे पुष्पों पर मंडराने लगती है। कोयल कूकने लगती है। बसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ शुक्ला पंचमी को उत्सव के रूप में आयोजित किया जाता है।

सभी पीत वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु एवं कामदेव की पूजा भी करते हैं। उस दिन पीला भोजन करना शुभ माना जाता गया है। यह हरित क्रांति ही हमारी संस्कृति की नींव है। अत: बसंत पंचमी का महत्व पर्यावरण शुद्धि और हरित क्रांति के क्षेत्र में भी हमारे ‘दर्शन’ का मूल आधार है।

ऐसी मान्यता है कि इस दिन पौधा रोपण करने से मां सरस्वती की कृपा होती है एवं इस दिन रोपा गया पौधा सरस्वती के वरदान से बिना सुरक्षा के भी वृक्ष का रूप लेकर बड़ा हो जाता है। अत: इस दिन का पर्यावरण क्षेत्र में भी बड़ा महत्व है।

‘प्रणो देवि सरस्वती, वाजे भिर्व जिनी वती धीनाम मणि त्रयवतु’
सरस्वती के रूप में यह हमारी बुद्धि, प्रज्ञा मनोवृत्तियों की संरक्षिका है। हममे जो आचार व मेधा है। उसका आधार भगवती सरस्वती हैं। इसकी समृद्धि व स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि बसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी।

इसलिए बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा होने लगी, जो आज तक चलती आ रही है। जो शिक्षाविद् भारतीयता से और भारतीय संस्कृति से प्रेम करते हैं वे इस दिन मां शारदे की पूजा करके उनसे ज्ञान वृद्धि एवं आचरण शुद्धि की प्रार्थना करते हैं।

समाज में शिशु को पाठशाला में प्रथम दिन प्रवेश कराने के लिए भी ‘बसंत पंचमी’ का दिन चुना जाता है। इस दिन का पौराणिक दृष्टि से और भी महत्व है। भगवान राम ने शबरी के आश्रम में शबरी से झूठे बैर भी इसी दिन खाए थे।

पं. रामगोपाल शर्मा, गुलाबपुरा

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