स्थानीय हो जनप्रतिनिधि

  • Devendra
  • 05/10/2023
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इस वर्ष के आखिरी माह में होने वाला विधानसभा चुनाव काफी अहम है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाला विधानसभा चुनाव वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव का एक तरह से सेमीफाइनल है। काफी हद तक यह सही भी है। इसीलिए इस वर्ष विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी कोई भी ‘रिस्क’ नहीं लेना चाहती। वहीं बिहार में जातीय जनगणना के आंकड़े पूरे देश में राजनीतिक समीक्षकों और राजनीतिक दलों को कुछ ‘अलग’ से सोचने को मजबूर कर दिया है। इसी कड़ी में देर-सवेर स्थानीयता का मुद्दा भी जोर पकड़ेगा। मसूदा विधानसभा क्षेत्र की जागरूक जनता ने स्थानीयता के मुद्दे पर बिगुल फूंक दिया है। निश्चित ही इस बिगुल की गूंज दोनों दलों (भाजपा व कांग्रेस) के आला पदाधिकारियों के कानों तक पहुंची होगी या फिर पहुंच जाएगी। कई बार राजनीतिक हित साधने के लिए राजनीतिक पार्टियां बाहरी (पैराशूट) उम्मीदवार को उस क्षेत्र की जनता के मत्थे पर थोप देती है। कई लोगों को ‘थोपना’ अतिरेक लग सकता है लेकिन काफी हद तक इसमें सच्चाई भी है। जनता के दुख:दर्द को विधानसभा या फिर लोकसभा सदन में पहुंचाने के लिए चुना हुआ प्रत्याशी बाहरी होने के कारण स्थानीय जनता के ‘बहुत’ करीब नहीं होता। जो करीब होते हैं उनकी समस्याओं का समाधान तो होता है, उनकी बात सदन के पटल पर रखी जाती है लेकिन जनता ठगी सी महसूस करती है। विशेष परिस्थतियों को छोड़ दिया जाए तो विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा चुनाव, स्थानीयता को प्राथमिकता दी ही जानी चाहिए। अहम सवाल यह कि क्या स्थानीय नेता सभाओं में ‘जाजम’ बिछाने के लिए ही है। बात जब छिड़ ही गई है तो स्थानीयता का मुद्दा जयपुर से लेकर दिल्ली तक सुनाई देनी चाहिए। जनप्रतिनिधि तो स्थानीय ही होना चाहिए। जय हिन्द।
दिनेश ढाबरिया

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