गणतंत्र दिवस : शांति, सौहाद्र्र और विकास के लिए संकल्प लेने का दिन

यही वह 26 जनवरी का गौरवशाली दिन है जब भारत ने आजादी के लगभग 2 साल 11 महीने और 18 दिन के बाद इसी दिन हमारी संसद ने भारतीय संविधान अंगीकार कर लिया।

खुद को संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करने के साथ ही भारत के लोगों द्वारा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन हर भारतीय को अपने देश में शांति, सौहार्द और विकास के लिए संकल्पित होना चाहिए।

कर्तव्य पालन के प्रति सतत जागरूकता से ही हम अपने को निरापद रखने वाले गणतंत्र का पर्व सार्थक रूप से मना सकेंगे और तभी लोकतंत्र और संविधान को बचाए रखने का हमारा संकल्प साकार होगा। हमने जिस सम्पूर्ण संविधान को स्वीकार किया है, उसमें कहा है कि हम एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष-लोकतंत्रात्मक गणराज्य हैं।

एक राष्ट्र के रूप में आज से 68 साल पहले हमने कुछ संकल्प लिए थे जो हमारे संविधान और उसकी प्रस्तावना के रूप में आज भी हमारी अमूल्य धरोहर हैं। संकल्प था एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, समतामूलक और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का जिसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने की पूर्ण अधिकार होगा।

नागरिक के इन ‘मूल अधिकारों’ में समता का अधिकार, संस्कृति का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा सम्बंधी अधिकार तथा सांविधानिक उपचारों का अधिकार उल्लिखित हैं।

अपने मूल अधिकारों की रक्षा और इनको नियंत्रित करने की विधियां भी संविधान में स्पष्ट हैं। इनके लिए हमारे संकल्प हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान है जिन्हें हम हर वर्ष 26 जनवरी को एक भव्य समारोह के रूप में दोहराते है।

लेकिन यह भी सच है कि इन 68 सालों में जहां हमने कुछ हासिल किया, वहीं हमारे इन संकल्पों में बहुत कुछ आज भी आधे-अधूरे सपनों की तरह है। भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, साम्प्रदायिक, वैमनस्य कानून-व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तमाम क्षेत्र है जिनमें हम आज भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पाए हैं। हालांकि इन्हें लेकर हमारे कदम लगातार सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ रहे हैं।

समाजवादी मूल्यों से प्रभावित एक समतावादी समाज की कल्पना और उसे तैयार करने के हमारे संकल्प सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तीनों स्तर पर अब तक पूर्णत: सफल नही रहे।

उदाहरण के लिए जब हमने समाज से जातिगत भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया तो उसे राजनीतिक पनाह मिल गई। नतीजन, दबे कुचलों के बीच भी कई सामंत फलने-फूलने लगे। कुछ शोषित शक्तिसम्पन्न तो जरूर हुए पर शोषित समाज वहीं का वहीं रहा। फर्क सिर्फ इतना हुआ कि कल तक जो समाज उपेक्षित था, आज तो वोट बैंक बन गया।

आज हमारी समस्या यह है कि हमारी ज्यादातर प्रतिबद्धताएं व्यापक न होकर संकीर्ण होती जा रही हैं जो कि राष्ट्रहित के खिलाफ है। राजनैतिक मतभेद भी नीतिगत न रह कर वयक्तिगत होते जा रहे हैं। नतीजन, लोकतांत्रिक परम्पराओं की दुहाई देते हुए भ्रष्टाचार एवं कालेधन जैसे गंभीर मुद्दों पर नियंत्रण के लिए की गई नोटबंदी भी सकारात्मक रूप नहीं ले पायी।

गणतंत्र बनने से लेकर आज तक अनेक कीर्तिमान सथापित किए हैं। इन पर समूचे देशवासियों को गर्व है। लेकिन साक्षरता से लेकर महिला सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मोर्चों पर अभी भी बहुत काम करना बाकी है। आज देश में राष्ट्रीय एकता, सर्व धर्म समभाव, संगठन और आपसी निष्पक्ष सहभागिता की जरूरत है।

संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य होने के महत्व को सम्मान देने के लिए मनाया जाने वाला यह राष्ट्रीय पर्व मात्र औपचारिकता बन कर न रह जाये, इस हेतु चिंतन अपेक्षित हैं।

अशोककुमार शर्मा (अध्यापक)  (यह लेखक के अपने विचार है)

भारतीय गणतंत्र की विशेषताएं
31 दिसम्बर 1929 को तत्कालीन कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने आधी रात को लाहौर में रावी नदी के तट पर तिरंगा फहराकर पूर्ण स्वराज्य की घोषणा की और 26 जनवरी 1930 के दिन को पूर्ण स्वराज्य दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया।

इस तरह 26 जनवरी 1930 से 26 जनवरी 1947 तक 18 बार 26 जनवरी को आजादी के दिवस के रूप में मनाया, परन्तु जब वास्तव में 15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई तो 26 जनवरी के दिन से जुड़ी यादों को संजोने के लिए ही इस दिन हमारा संविधान लागु किया गया।

जबकि संविधान इससे 2 माह पूर्व ही 26 जनवरी 1949 को तैयार हो चुका था। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद होकर लोकतंत्र तो बन चुका था परन्तु लोकतंत्र की पराकाष्ठा जिसे गणतंत्र कहते हैं वह 26 जनवरी 1950 को बना। 9 दिसम्बर 1946 से 26 नवम्बर 1949 तक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता वाली संविधान सभा तथा डॉ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व वाली प्रारूप समिति ने 2 वर्ष 11 माह 10 दिन के अथक परिश्रम से बनाए विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को लागू किया गया।

यद्यपि हमारे संविधान पर ब्रिटिश प्रभाव सर्वाधिक है परन्तु ब्रिटेन के इतर भारत ने गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था को लागू किया, जिससे राष्ट्राध्यक्ष वंशानुगत न होकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।

भारतीय गणतंत्र एकात्मक व संघात्मक शासन के संसदीय रूप से सुसज्जित है। कई देशों के संविधानों की विशेषताएं हैं। भारतीय गणतंत्र की यात्रा जो 26 जनवरी 1950 से चली, आगे भी इसी मजबूती और सफलता के साथ चलती रहे। देश के हर नागरिक की यही अपेक्षा है।

महावीर शर्मा, संचालक, अन्नपूर्णा कोचिंग क्लासेज, बिजयनगर

गणतंत्र है आया
आज मेरे देश में गणतंत्र है आया
देश में हर तरफ लोकतंत्र है छाया
ना करना अब हमसे कोई सवाल
स्वैच्छिक किया है हमने मतदान
अब न सुनेंगे कोई बहाना
लोकतंत्र ही है शक्ति भलीभांती जाना
अगर की अपनी मनमानी
सुनेंगे नहीं कोई कहानी
फिर से उठालेंगे हथियार
मतदान है हमारा अधिकार
अगर आना है अगली बार
विकास करो इस बार

देवराज कुमावत, बिजयनगर

देश मेरा ये सबसे न्यारा…
जब आंख खुले तो धरती हिन्दुस्तान की हो
जब आंख बन्द हो तो धरती हिन्दुस्तान की हो
हम मर भी जाएं तो कोई गम नहीं लेकिन
मरते वक्त मिट्टी हिन्दुस्तान की हो
हंसते-हंसते जान देना किसी के रीत में नही
वीरों की ऐसी कहानी किसी देश के अतीत में नहीं
यहां तो लोग नसीब को कोसते हैं
वतन के लिए जान देना सबके नसीब में नहीं
बारी-बारी ऋतुएं आती अपनी छंटा यहां दिखलाती
फूल-फूलों से भरे बगिये चिडिय़ां मीठे गीत सुनाती
देश मेरा ये सबसे न्यारा कितना सुन्दर कितना प्यारा

माधव पुरोहित, विद्यार्थी

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