एक शहर, दो मिजाज…!

राज खोसला के निर्देशन में 1969 में हिन्दी सिनेमा के प्रथम सुपरस्टार राजेश खन्ना-मुमताज अभिनीत फिल्म ‘दो रास्ते’ एक पारिवारिक फिल्म थी, जो दो भाइयों के अलग-अलग मिजाज-व्यवहार पर आधारित थी। इस फिल्म के सभी गाने खूब चर्चित रहे। पाठकों का यह सवाल होगा कि आखिर पांच दशक पूर्व बनी इस फिल्म का यहां जिक्र क्यों? मुद्दे पर आने से पूर्व इसका उल्लेख जरूरी है।
बिजयनगर शहर में निवास करने वाले लोगों में अलग-अलग मिजाज है। एक ओर इस भीषण गर्मी में राहगीरों के हलक तर करने के लिए कहीं शीतल पेय तो कहीं तरबूज वितरित किए जा रहे हैं। वहीं पीपली चौराहे पर दिनदहाड़े सरेआम किसी युवक पर कुछ लोग लाठी-डंडों से जानलेवा हमला कर देते हैं, लेकिन कोई बीच-बचाव में आगे नहीं आता। अलबत्ता, कुछ लोगों में पिट रहे युवक को बचाने के बजाय इस दृश्य को अपने-अपने मोबाइल में कैद करने की होड़ सी मच जाती है। गरज यह कि भीषण गर्मी में शीतल पेय वितरित करने वाले यदि ‘विवेकशील’ हैं तो फिर पिट रहे युवक को बचाने के बजाय मोबाइल से मारपीट के दृश्य को कैद करने वालों को ‘विवेकशून्य’ कहना कोई अतिश्योक्ति तो नहीं। गुरु पन्ना की धरती पर विवेकशील होना यहां के लोगों का मिजाज है तो फिर विवेकशून्य आचरण करने वाली जमात को क्या कहा जा सकता है? तनिक सोचिए! शीतल पेय वितरित करने वालों पर यदि गर्व किया जा सकता है तो फिर मारपीट की घटना को मोबाइल से कैद करने वालों पर शर्मिंदगी भी महसूस करनी होगी।

स्मरण रहे, इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पूर्व पीपली चौराहा के समीप पोहा बेचने वाले के साथ युवकों ने मारपीट कर उसे चोटिल कर दिया। दूसरी घटना होटल एन. चन्द्रा पैलेस के सामने स्थित सिनेपलेक्स थियेटर की है जहां कुछ युवकों ने थियेटर के ऊपर के माले में रेस्टोरेंट में बैठे युवक के साथ मारपीट कर दी। हालांकि दोनों मामले थाने पहुंचे थे। निश्चित ही शहर में आए दिन इस तरह की घटना से प्रबुद्धजन चिंतित हैं और बच्चे-महिलाएं भयभीत हैं। कुछ युवकों की मानसिकता के चलते पूरे शहर के शांतिप्रिय मिजाज को कलंकित नहीं किया जा सकता। पुलिस प्रशासन को चाहिए कि ऐसे सिरफिरे युवकों पर सख्ती से पेश आए। गुरु पन्ना की धरती की यही पुकार है और निवेदन भी। चलते-चलते यदि समय हो तो फिल्म ‘दो रास्ते’ का एक गाना ‘दो रंग दुनियां के और दो रास्ते, इक रस्ता मंदिर को जाए इक जाए मयखाने को, दोनों ही जीने के वास्ते…’ सुनिएगा जरूर।
दिनेश ढाबरिया, सम्पादक

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