न्याय शास्त्र के प्रणेता थे महर्षि गौतम

महर्षि गौतम जयंती पर विशेष
बिजयनगर। श्री गौतम जी महर्षि ब्रह्माजी के सातवें पुत्र भृगु जी, भृगु जी के पारब्रह्म जी, पारब्रह्मजी के कृपाचार्य और कृपाचार्यजी के दो पुत्र दधीची व शक्तिश्वर्मा हुए। शक्ति श्वर्मा के 5 पुत्र हुए (1) पाराशरजी, (2) सारस्वतजी (3) ग्वालाजी (4) गौतम जी (5) श्रृंगी जी हुए। गौतम जी महर्षि के एक पुत्र शलानन्द जी जो राजा जनक के राजगुरु व राजपुरोहित थे व एक पुत्री माता अंजना जिनके बाल्यवस्था में तपस्यारत रहते हुए कर्ण के द्वारा हनुमान जी की उत्पत्ति हुई।

महर्षि गौतम को गुर्जर कर्ण राजा जो कि उस समय चक्रवर्ती सम्राट थे उन्होंने महर्षि गौतम को पुत्रेष्ठी यज्ञ करने बाबत पुष्कर में लेकर पधारे। महर्षि गौतम माता अहिल्या के साथ सपरिवार आकर निवास किया। महर्षि गौतम कर्मकाण्ड में पूर्ण कुशल व न्याय शास्त्र के प्रणेता थे। महर्षि गौतम को अक्षपाद भी कहते हैं। महर्षि गौतम के दाये पैर के पगथली के बीच में एक अक्ष है।

माता अहिल्या गंगा की बहिन है व ब्रह्मा जी की मानस पुत्री है। ब्रह्माजी ने माता अहिल्या को गौतम ऋषि के तपबल, ज्ञान, कर्मकाण्ड से विभोर होकर उन्हें परिणिता की थी। जब राजा गुर्जर कर्ण की प्रार्थना पर महर्षि गौतम पुष्कर आए तब उस समय तीन बरस से वहां वर्षा नहीं हो रही थी, त्राहि-त्राहि मची हुई थी। तब गौतम जी ने अपने तपोबल से वहां वर्षा कर दी। जिससे पुष्कर क्षेत्र धन-धान्य से पूर्ण होकर मनोवांछित फल देने वाला बन गया।

यह देखकर अन्य ब्राह्मण महर्षि गौतम जी से ईष्र्या करने लग गए और ब्राह्मण ने एक मायावी गाय उत्पन्न की। ये मायावी गाय वहां की सारी औषधी, चारा आदि चर गई। इस पर महर्षि गौतम ने अपने शिष्यों से कहा कि गाय को इस क्षेत्र से बाहर कर दो लेकिन वह गाय वहां से नहीं निकली। तब गौतम जी ने उठकर हाथ खड़ा कर दिया जिससे वह गाय अदृश्य हो गई तो उस ब्राह्मण ने गौतम जी को गौ-हत्या का दोषी बना दिया।

इसके बाद महर्षि गौतम ने वह क्षेत्र छोड़कर तीर्थाटन करने चले गए। उन्होंने नासिक में त्रयम्बेकश्वर में जो नदी है, उसके तट पर तपस्या करने लगे आज वह नदी गौतमी नदी के नाम से जानी जाती है। तपस्यालीन रहते हुए ब्रह्माजी, विष्णुजी व शिवजी ने महर्षि गौतम को दर्शन दे ब्रह्म हत्या से मुक्त कर दिया। जब महर्षि गौतम त्रयम्बेकशर में थे तब उनके साथ न तो शिष्य थे न ही उनका पुत्र था।

वो सब यहीं पुष्कर में ही रहे तथा राजा को ही अपना पिता माना। राजा गुर्जर कर्ण के मान-सम्मान प्रतिष्ठा व वंशवृद्धि के लिए उन्होंने ऐसा किया तब से गुर्जर गौड़ ब्राह्मण कहलाए। महर्षि गौतम ब्राह्मण समाज के जन्मदाता थे। वे कई प्रतिभाओं के धनी थे। धनुर्विद्या के राजगुरु थे। गायत्री के उपासक थे। गायत्री मंत्र उन्हीं की देन है। वह न्याय शास्त्र के प्रणेता भी थे।
साभार: भारत व्यास, बिजयनगर

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