भक्ति करने के लिए निहित हैं नवरात्र के नौ दिन

बिजयनगर। नवरात्रि का अर्थ हैं ‘नो रातें’ इन नो रातों में शक्ति के नो रूपों की पूजा का विधान हैं। शास्त्रों के अनुसार शक्ति के नो रूप निम्न प्रकार है। जो नव दुर्गा के नाम से जाने जाते है। इसका अर्थ यह है कि जब-जब भी पृथ्वी पर अत्यचारी असुरो का आतंक फैला तब-तब शक्ति के विभिन्न रूपों का अवतार हुआ जिनके द्वारा अत्याचारी असुरों का संहार हुआ। अब प्रश्न यह उठता है कि नवदुर्गा के रूपों की उत्पत्ति कैसे हुई और उनके नाम क्या-क्या है तथा उनकी नो दिनों में पूजा विधि क्या है।

नवदुर्गा की उत्पत्ति
कामदेव ने जब समाधिस्त शिव की तपस्या को ‘रति’ (कामदेव की पत्नी) के साथ मिल कर भंग किया तो शिव ने तीसरा नेा खोल कर कामदेव को भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी ने अपने पति की राख से एक मूर्ति बनाई जो अति सुन्दर थी। शिव ने उसे देखकर ‘भंड-भंड’ शब्द का उच्चारण किया जिससे उस राख की मूर्ति में जान आ गई। चूंकि वह ‘शिव’ के क्रोध से पैदा हुआ था अत: उसमें तामसिक वृत्ति का संचार हो गया। आसुरी प्रवृत्ति उसमें पैदा हो गई। शिव का वरदान प्राप्त करके वह महाशक्तिशाली राक्षस ‘भंडासुर’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

अपने शक्ति और पराक्रम से उसने सभी देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली। इन्द्र का साम्राज्य छीन लिया। तब सभी देवगण भगवान शिव की स्तुति करने लगे। तब शिव की नाभि से सोडषी विद्या देवी की उत्पत्ति हुई जिसका नाम त्रिपुर सुन्दरी था। उसने ‘भंडासुर’ का संहार किया। उसके बाद नौ विद्या द्वारा नवदुर्गा रूपों की उत्पत्ति हुई, जिन्होंने समय-समय पर अत्याचारी निशाचारों का संहार करके पृथ्वी को अत्याचार से मुक्त किया। नवरात्रि पर्व दुर्गा के उन नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना का पर्व माना जाता है। दुर्गा के नो स्वरूप एक-एक रात्रि का क्रमश: अवतरित हुए।

सभी स्वरूप मिल कर नवदुर्गा के रूप में प्रसिद्ध हुए। नौ तिथि, नौ वार एवं नौ नक्षत्रों में उनकी अलग-अलग पूजा का विधान बना जो क्रमश: इस प्रकार है।
(1) प्रथम रात्रि को मां शैल पुत्री की पूजा का विधान है। इस की उत्पत्ति पर्वतों से हुई। अत: इसका नाम शैल पुत्री हैं।
(2) द्वितीय रात्री को ब्रह्मचारिणी देवी के पूजा का विधान है। इसने आजन्म ब्रह्मचर्यव्रत धारण किया। अत: मां ब्रह्मचारिणी कहलाई।
(3) तृतीय रात्रि को मां चन्द्र घंटा देवी की पूजा का विधान है। यह देवी चन्द्रमा के समान चमकने वाली है। अत: चन्द्र घंटा देवी के नाम से प्रसिद्ध हैं।
(4) चत्तुर्थ रात्रि को कूष्माण्डा देवी की पूजा का विधान है। इसने सम्पूर्ण जगत का निर्माण किया। पूरा जगत इसके पांवों में निहित हैं। अत: यह मां कूष्माण्डा के नाम से प्रसिद्ध हैं।
(5) पंचम रात्रि को स्कन्ध माता की पूजा का विधान है। यह देवी कार्तिकेय की माता है। अत: यह स्कन्ध माता के नाम से प्रसिद्ध हैं।
(6) सष्ठ रात्रि को कात्यायनी देवी की पूजा का विधान है। इसका जन्म कात्यायन आश्रम में हुआ था। अत: यह कात्यायनी माता के नाम से प्रसिद्ध हैं।
(7) सप्तम रात्रि को कालरात्रि माता की पूजा का विधान है। यह देवी काल का विनाश करने वाली मां है। अत: यह काल रात्रि माता के नाम से प्रसिद्ध हैं।
(8) अष्ठम रात्रि को महागौरी माता की पूजा का विधान है। यह माता अत्यंत गौर वर्ण की है। अत: यह माता महागौरी मां के नाम से प्रसिद्ध हैं।
(9) नवम रात्रि को माता सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है। यह माता सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली मां है। अत: यह सिद्धि दात्री माँ के नाम से प्रसिद्ध हैं।
(10) इन दो देवियों का संतिश्रित स्वरूप ही ‘मां दुर्गा’ है। यह माता कष्टों का नाश करने वाली दुर्गम परिस्थितियों में सहायता प्रदान करती हैं। अत: यह दुर्गा मां के नाम से प्रसिद्ध हैं। माता दुर्गा की पूजा का विधान नवरात्रि में इन नव दुर्गा स्वरूपों के साथ वर्णित है। नौ दिनों तक दुर्गा सप्तसती के पाठ का विधान है। जिससे माता के उक्त नव स्वरूपों का वर्णन किया गया है।

उक्त सभी शक्तियों की उत्पत्ति भगवान शिव की नाभि से मानी जाती है। सृष्टि के प्रलयोपरान्त उक्त सभी शक्तियां पुन: भगवान शिव की नाभि में विलीन हो जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार इन नव शक्तियों की पूजा का विधान नवरात्रि में क्रमश: नौ दिन तक अलग-अलग वर्णित है। सामान्य जन नवरात्रि में नो शक्तियों के समिश्रित स्वरूप दुर्गा माता की पूजा करते हैं, जो लोक प्रसिद्ध है।

दुर्गा सप्तसती का पाठ करते हैं और अपनी अभिष्ट सिद्धि को प्राप्त करते है। ये नौ दिन भक्ति करने के निहित हैं। इन दिनों में किया गया यज्ञ, अनुष्ठान, जाप, पाठ आदि मंत्र सिद्धियों देने वाला माना गया है। दसवें दिन मां दुर्गा का महोत्सव शोभायात्रा के रूप में निकाला जाता है। माता के नौ स्वरूपों की नवरात्रि में क्रमश: अलग-अलग पूजा का विधान लेख की विस्तर्णता के कारण नहीं दिया जा रहा हैं। सामान्य जन के लिए माता दुर्गा की पूजा ही सर्व श्रेष्ठ मानी गई है।

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