जरूरी है राजस्थान की परम्परा और संस्कृति का संरक्षण

लोक-परम्परा और संस्कृति से शहरी लोग इन्हीं अवसरों पर रूबरू होते हैं। वहीं लोक कलाकारों को भी इस परम्परा को जीवित रखने का हौसला मिलता है।
– जय एस. चौहान –
बिजयनगर व गुलाबपुरा में शाही लवाजमे के साथ निकली इसर-गणगौर की सवारी में लोक कलाकारों को अवसर देकर आयोजकों ने सराहनीय कार्य किया है। लोक गायन व नृत्य, लोक संस्कृति राजस्थान की धरोहर है। इसके दो पहलू हैं। एक तो लोक-परम्परा और संस्कृति से शहरी लोग इन्हीं अवसरों पर रूबरू होते हैं।

वहीं लोक कलाकारों को भी इस परम्परा को जीवित रखने का हौंसला मिलता है। निश्चित ही, कालबेलिया नृत्य अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी पहचान रखता है। गेर नृत्य भी लोकप्रिय हो रहा है। राजस्थान के गौरवशाली इतिहास की तरह ही यहां की परम्परा और संस्कृति काफी समृद्ध है। जरूरत है, इन पारम्परिक संस्कृति के साथ लोक कलाओं के संरक्षण की।

स्थानीय स्तर पर शैक्षणिक संस्थाओं को भी अपने वार्षिकोत्सव पर इन कलाकारों को अवसर देकर एक पहल करनी चाहिए। नौनिहाल अपनी संस्कृति से परिचित तो होंगे ही, लोककला को भी संरक्षण मिल जाएगा।

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