राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा

जयंती पर पूजा-पाठ
हनुमान जयंती पर मंदिरों में पूजा अनुष्ठान कराया जाता है। हनुमान जी को नया ‘चोला’ चढ़ाया जाता है। ‘सुन्दरकांड’ का पाठ, हनुमान चालीसा का पाठ और रामायण पाठ भी किया जाता हैं। भक्त तन-मन-धन से श्री हनुमान जी की पूजा करते हैं। ‘बजरंग बाण’ ‘हनुमान बाहुक’ आदि का पाठ करके भक्तजन रोग-शोक एवं दरिद्रता से मुक्त होते हैं। लोक मान्यता के अनुसार हनुमान जयंती को हनुमान जी की पूजा-अर्चना यज्ञ-अनुष्ठान तथा जप-तप एवं पाठ करने का प्रतिफल अवश्य प्राप्त होता है।

चैत्र मास का शुक्ल पक्ष पौराणिक दुष्टि से अति महत्वपूर्ण पक्ष है। क्योंकि इस पक्ष में ‘अतीत काल’ में कई महान विभूतियों का अवतरण हुआ। चैत्र शुक्ला नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अवतरण हुआ। चैत्र शुक्ला तेरस को भगवान महावीर स्वामी और पूर्णिमा को रामभक्त श्री हनुमान जी की जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष चैत्र शुक्ला पूर्णिमा 31 मार्च हनुमान जयंती मनाई जाएगी।

हनुमानजी के जन्म की कथा
माता अंजनी और केसरी के कोई संतान नही थी। ‘केसरी’ ने भगवान शिव की भक्ति की एवं उनसे प्रार्थना की कि मुझे पुत्र प्रदान करें। मोहिनी रूप देखते हुए भगवान शिव ने अपने ‘ओज’ को पवन देव को दिया और कहा कि उसे माता अंजनी के गर्भ में पोषित करें। इसके प्रभाव से माता अंजनी को पुत्र की प्राप्ति हुई। इसलिए हनुमान को ‘पवन पुत्र’, ‘शंकर सुवन’. केसरी के घर पैदा होने से ‘केसरी नन्दन’, अंजनी के गर्भ से जन्म लेने के कारण ‘अंजनि सुत’और इन्द्र के वज्र के प्रहार से इनकी ठुड्डी (हनु) टेढ़ी होने के कारण हनुमान भी कहते हैं।

नटखट थे हनुमान
बचपन में हनुमान बड़े ‘नटखट’ थे। एक बार पूरे शरीर पर सिंदूर का लेप करके उस पर चमकीला पत्र चिपका लिया था। तब से हनुमान जी की प्रतिमा पर सिंदूर का चोला एवं माली पन्ने (चमकीला पत्र) चढ़ाने की परम्परा आरम्भ हुई।

जब सूर्य को निगल लिया
बचपन में सूर्य को देखकर हनुमान जी ने सोचा कि कोई मधुर फल है। उसे निगल गए। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। सृष्टि का अस्तित्व समाप्ति के कगार पर पहुंच गया। विष्णु भगवान ने माता अंजनी से कह कर सूर्य को मुक्त कराया। तभी से हनुमान जी तीनों लोकों में उजागर (प्रसिद्ध) हो गए। ‘जय कपीश तिहुं लोक उजागर, युग सहज योजन पर भानु, लील्यो ताहि मधुर फल जानू’ अर्थात् हनुमान जी सूर्य को मीठा फल समझ कर निगल गए।

समस्त विद्याओं के ज्ञाता
श्री हनुमान जी समस्त विद्याओं के ज्ञाता थे। गुणों का खजाना एवं बल-विद्या-बुद्धि पराक्रम और आत्म बल का पारावार थे। उनकी बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए देवताओं ने समुद्र पार करते समय ‘सुरसा’ (सर्पों की माता) को भेजा। हनुमान जी अपना स्वरूप बढ़ाते गए। सुरसा ने भी मुख बढ़ाना शुरू कर दिया, जब सुरसा ने मुख को विशाल कर दिया तो हनुमान अत्यंत लधु रूप धारण करके बाहर आ गए। यह उनकी बुद्धिमानी की परीक्षा थी।

जब पहुंचे अयोध्या…
रावण का वध करके श्रीराम अयोध्या में आए, हनुमान भी उनके साथ थे। कुछ दिन अयोध्या में हनुमान ने निवास किया। एक दिन श्रीराम ने हनुमानजी को कहा कि आज राज महल में माता-पिता सीता के हाथ से बनाया हुआ भोजन करें। हनुमान राज महल के रसोईघर में आसन पर बैठ गए। माता सीता ने भोजन परोसा। हनुमान जी खाते गए, राज महल का समस्त भोजन समाप्त हो गया। रसोईये बनाते गए, हनुमान जी खाते गए। कहते गए, मां अभी भूखा हूं।

अयोध्या नगरी के पंसारियों का सारा सामान समाप्त हो गया, लेकिन हनुमान जी भूखे के भूखे। अचानक श्रीराम जी रसोई घर में आए। माता सीता ने सारा वृतांत सुनाया। श्रीराम ने सीता जी से कहा कि वैसे तो हनुमान तृप्त नहीं होंगे। इनकी थाली में तुलसी का पत्ता परोस दो। सीता जी ने वैसा ही किया। तुलसी का पत्ता परोसते ही हनुमान जी ने डकार लेते हुए कहा, ‘बस माता अब तृप्ती हो गई।’ तभी से बड़ी रसोई (खाने) में तुलसी डालने की परम्परा है।

स्वामीभक्ति की परीक्षा
एक बार श्रीराम ने हनुमान जी की स्वामिभक्ति की परीक्षा लेनी चाही। उन्होंने सोने के मणियों की माला हनुमान जी के गले में डाल दी। हनुमान जी ने स्वर्ण मणियों को चबा-चबा कर नोच डाल दिया। श्री राम ने कहा हनुमान यह क्या कर रहे हो, यह खाने की वस्तु नहीं है। हनुमान जी ने कहा कि मैं इसके अन्दर श्री राम को खोज रहा हूं, लेकिन ‘श्रीराम’ इसमें नहीं है।

अत: यह माला मेरे काम की नहीं है। जवाब सुनकर श्रीराम बोले ‘क्या तुम्हारे अन्दर श्री राम हैं।’ हनुमान जी ने अपना सीना फाड़ कर श्रीराम को उन्हीं के दर्शन करा दिए और कहा कि मेरे रोम-रोम में श्री राम का निवास है। श्रीराम ने प्रसन्न होकर उन्हें ‘अमरता’ का वरदान दिया। अत: हनुमान जी के ‘मृत्यु’ का प्रसंग हमें किसी शास्त्र पुराण में उपलब्ध नहीं होता है। हनुमान जी आज भी अमर हैं। ऐसी मान्यता है कि जहां ‘रामायण पाठ’ होता है वहां आज भी हनुमान जी किसी न किसी रूप में आकर बैठते हैं।
अंजनी गर्भ संभूतं,
वायु पुत्रो महाबल:।
कौमायर्यो ब्रह्मचारी च
हनुमन्ताय नमो नम:।।


पंडित रामगोपाल शर्मा, ज्योतिषाचार्य, गुलाबपुरा

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