वर्तमान को वर्धमान की जरूरत-मुनि संबोधकुमार

मत कहो महावीर नहीं है, महावीर जिंदा है…. मानवता की आत्मा में ….. आर्दशों-आदतों में, किस्सो-कहानियों में गीतों-कविताओं में, आगम ग्रंथों में…. सोच में… नोटबंदी में जीएसटी-स्वच्छ भारत अभियान में, स्टिंग ऑपरेशन में…. गुनाहों के शिकंजों में… कर्मों की थ्योरी में क्षमायाचना के भावों में, मानवता की सेवा में संवेदना में… प्रार्थनाओं में अलग-अलग तरीकों से जिनशासन की प्रभावना प्रतिष्ठा में… कहां नहीं है महावीर…।

‘ये जिन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया’ बात अगर महावीर की हो तो महावीर धरती पर सूरज और चांद की तरह हैं, न किसी से ज्यादा न किसी सेे कम। उनकी पावनता ने मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे-गिरजाघर, हिन्दू-मुस्लिम, सिख, ईसाई, अमीर-गरीब के बीच भेदभाव, पक्षपात की दीवारें खड़ी होने नहीं दी। महावीर ‘आय तुले पयासू’ के तरफदार थे, उनका यकीन था जब मनुज के रगों में दौड़ते खून का रंग एक है, जब कुदरत ने हममें धरती पर पूरी मानवता से तालमेल बिठाने की प्रेरणा से भिगोकर उतारा है तो हमें क्या हक है इंसान और इंसान के बीच फासलों की फसल बोने का?

मत कहो महावीर नहीं है, महावीर जिंदा है…. मानवता की आत्मा में ….. आर्दशों-आदतों में, किस्सो-कहानियों में गीतों-कविताओं में, आगम ग्रंथों में…. सोच में… नोटबंदी में जीएसटी-स्वच्छ भारत अभियान में, स्टिंग ऑपरेशन में…. गुनाहों के शिकंजों में… कर्मों की थ्योरी में क्षमायाचना के भावों में, मानवता की सेवा में संवेदना में… प्रार्थनाओं में अलग-अलग तरीकों से जिनशासन की प्रभावना प्रतिष्ठा में… कहां नहीं है महावीर…। हर तरफ, हर जगह, हर कहीं पर हैं। हां, उसी का नूर रोशनी का कोई दरिया तो है।

हां कही पे जरूर जिन्दगी उसी की है जो इंसानियत के दर्द का हमदर्द बनें। प्रभू महावीर की साढ़े बारह साल की साधना अब तक मानवता के बदन पर दु:खों परेशानियों के घावों का मरहम बन रही है। महावीर का धर्म बंदिशों- बंधनों में कैद नहीं करता… वह हर हाल में मुक्ति का शाश्वत शांति का राजमार्ग गनता हैं।

दौर कैसा भी हो, समय के पहलू की रंगत हो या फीकी, द्वापर, त्रेता, कलयुग हो या सतयुग की दस्तक महावीर की आप्तवाणी जीवन को समस्याओं से दूर ले जाकर खुशनुमा समाधान की सौगात देती हैं। ये जो जिन्दगी में जद्दोजहद है कशमकश है… रोज तनाव का एक नया रूप है, बीमारियां हैं, रिश्तों की दीवारों में दरकने हैं, ये महज इसलिए है कि हम महावीर को मानते हैं, मगर महावीर की नहीं मानते। इस पूरी कायनात की रंगते बदलने लगेगी, हवाओं में अमन-चैन की बयारें चलने लगेंगी…।

इंसान और इंसान के बीच दूरियां सिमटने लगेंगी, कुदरत की कराहट को सुकून मिलने लगेगा। बशर्ते कि यकीन करें कि महावीर जिंदा हैं। किताबों, चौराहों, मंदिरों, दुकानों के नामों, साधु-साध्वियों के प्रवचनों में बाहर लाकर जिन्दगी में जरा उतारकर देखें, समस्याओं की अर्थी निकलते देर नहीं लगेगी।

जीवन के टूटते-बिखरतेे मानकों को अगर फिर कोई सहारा दे सकता है तो वह है महावीर दर्शन। अपाहिज मानवीय मूल्य, सियासत की कमतर होती पारदर्शिता, बदहवास बार-पब की संस्कृति में घुटती भावी पीढ़ी की वैसीखी अगर कोई बन सकता है तो एक इकलौती महावीर वाणी। रोज बेआबरू होती नारी का वजूद, नासुर की तरह सरती बेइमानी… समाधान? महावीर के उपदेश, संदेश.. निर्देश।

चैत्र शुक्ला त्रयोदशी… महावीर जयंती दुनिया में हजारों तौर-तरीके से उत्सव के ताने-बाने में बुना जाएगा। कहीं शराबबंदी .. कहीं रक्तदान। पहलू कई, मगर मकसद… महावीर के पैगाम को हर घर-आंगन… हर एक धकडऩ तक पहुंचाना….।

यह कवायद समाज में पर्दे के पीछे पनपी कुरीतियों, अंधविश्वासों और जड़ताओं के जड़ से नेस्तानुबूत करने की मुहिम बने। परम तीर्थंकर प्रभु महावीर के ‘समय गोयम मा णमायऐ’ एगो माणुसा जाति ‘सोही उज्जुभुयस्स धम्मो शुद्धस्स चि_इ’ ‘लाना लाभा सुहे दुखे-जीवीये मरणे तहा समो निंदा पसंसास् तहा माणाओ माणरो’, सच्चं भयंवं सच्चं लोयम्मि सारभुयं’, ‘कोहो पिउ पणासेइ, माणो विणय तासणो, माया मित्ताणि नासेइ’, ‘लोभो सव्व विणासणो’ आदर्श स्वरों को सिद्ध कर आदमी को सही मायने में आदमी बनाए। तमाशा बनती जिन्दगी की राह में सिद्धि, बोधि निर्वाण की छिवन बिछाये… घर-घर देहरी-देहरी कहीं एक-दूसरे को देखकर होठों पर तंग हो चुकी मुस्कुराहट को फिर लौटा लाए।

यही इसकी पावनता की सिद्धी हैं। क्षत्रिय कुण्डपुर के उस महामहिम की महिमा गाए न गाए, माला में सुमिरन करे ना करें, पूजा-अर्चना -आराधना करें न करें, पर इतना जरूर करें कि महावीर को जानने के बजाय जीने की मुहिम शुरू करें। महावीर तस्वीर में हो ना हो तदबीर और तकदीर में हो।
रोज रोज उपदेश भुलता है आदमी,
रोज रोज संत फकीर नहीं आएंगे।
धरती के दु:ख हमें आपस
में ही बांटने होंगे,
मोक्ष से लौटकर महावीर
नहीं आएंगे।

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